रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २०१
सवैया
आली लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना । गठनि पै छलकै छवि कु डल मंडित कुन्तल रूप की सैना ॥ दीरघ बक बिलोकनि की अवलोकनि चोरति चित्त को चैना । मो रसखानि रट्यौ चित री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना ॥६८॥ शब्दार्थ—पियरो = पीला । उपरेना = वस्त्र । कु तल = केश, माला । सैना = सेना । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वे श्याम कृष्ण वादल से सुन्दर हैं। उसी प्रकार उनके शरीर पर पीला वस्त्र सुशोभित है । उनके कपोलो पर कुंडलो की शोभा झलक रही है । सुन्दर केश रूप का समूह हैं; अथवा रूप की सेना सुन्दर भाले लिए हुए हैं। वे अपने दीर्घ नेत्रो की वक्र दृष्टि से देखते ही मन के चैन को चुरा लेते हैं। हे सखि ! उस आनंद-सागर कृष्ण ने मुस्कराकर तथा अपने ओठों से अमृत जैसे शब्दो को बोलकर मेरे मन को हर किया है ।
सवैया
वह नद को साँवरो छैल अली अब तौ अति ही इतरान लग्यौ । नित घाटन बाटन कुंजन मै मोहि देखत ही नियरान लग्यौ । रसखानि वखान कहा करियै तकि सैननि सो मुसकान लग्यौ । तिरछी बरछी सम मारत है दृग-बान कमान सुकान लग्यौ ॥६९॥ शब्दार्थ—छैला = छैला । अली = सखी । नियरान = समीप । सुकान लग्यो = कानो तक खींचकर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की आदतो का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह नद-पुत्र छैला कृष्ण अब तो बहुत अधिक इतराने लगा है। वह प्रतिदिन घाटो पर, मार्गों पर और कुंजो मे मुझे देखकर मेरे समीप आने लगा है, अर्थात् जहाँ भी मुझे देखता है, मेरे पास चला आता है। रसखान कहते हैं कि मैं कहाँ तक उसकी आदतो का वर्णन करूँ । वह मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगता है। वह टेढी दृष्टि को मुझ पर बरछी की भाँति मारता है और नेत्र-वाणो को कमान पर कानो तक खींच कर चलाता है । विशेष—उपमा, रूपक अलकार ।