रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया मोहन रूप छकी वन डोलति घूमति री तजि लाज विचारैं । बंक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारैं ॥ रंगभरी मुख की मुसकान लखे सखी कौन जु देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमत-करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ॥७०॥ शब्दार्थ—वक विलोकनि = तिरछी दृष्टि । रंगभरी = प्रेम भरी । अर- विन्द = कमल । हिमत-करी = हेमंत रूपी हाथी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा तज्जन्य प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं कृष्ण के सौन्दर्य से उन्मत्त होकर तथा लोक-लाज को छोड़कर वन-वन घूमती फिर रही हूँ । कृष्ण की तिरछी दृष्टि, विशाल नेत्रों की कोर सभी को अपने कटाक्षों से मार देती है। हे सखि ! कृष्ण के मुख की प्रेमभरी मुस्कान को देखकर कौन ऐसी युवती है जो अपने-आप को सँभाल सकती है, अर्थात् सभी उस मुस्कान के वशीभूत हो जाती हैं और इस प्रकार व्यथित हो जाती हैं जैसे हेमत रूपी हाथी ने कमल को झटके से तोड़कर तथा मरोड़कर डाल दिया हो । विशेष—रूपक और अर्थान्तरन्यास अलंकार है । पाठान्तर—इस सवैया का यह रूप भी मिलता है— 'मोहन रूप छकी वन डोलति घूमि गिरी तजि लाज विचारैं । बंक विलोकनि नैन विसाल सु दीपति कोर कटाछन मारैं । रंग भरे मुख की मुसकानि लखै सखि को निज देह संभारैं । ज्यो अरविन्दहि मत्त करी झकझोरि कै तोरि कै मोहि कै डारै ॥' सवैया आज गई ब्रजराज के मंदिर सुन्दर स्याम विलोक्यौ री माई । सोइ उठ्यौ पलिका कल कंचन बैठ्यौ महा मनहार कन्हाई ॥ ए सजनी मुसकात लख्यौ रसखानि विलोकनि वक सुहाई । मैं तब ते कुलकानि तजी सुवजी ब्रजमंडल माँह दुहाई ॥७१॥ शब्दार्थ—मंदिर = घर । पलिका = पलंग । कंचन = सोना । मनहार = मन को हरने वाला । विलोकनि वक = वक्र दृष्टि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । आज मैं कृष्ण के घर गई थी, वहाँ पर मैने सुन्दर