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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 368 में से

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व्याख्या भाग २०३ कृष्ण को देखा। वह मन को हरने वाला कृष्ण अपने सुन्दर सोने के पलंग पर सोकर बैठा था। हे सजनी ! उस आनन्द-सागर कृष्ण को मुसकराता हुआ तथा उसकी सुन्दर वक्र-दृष्टि को देखकर मैने तभी से कुल की मर्यादा को छोड़ दिया है, अर्थात् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो गई हूँ। इसी कारण ब्रजमण्डल मे दुहाई मच रही है, अर्थात् कृष्ण सभी के मन का हरण करने वाले है, उससे बचने के लिए सारी ब्रज-युवतियाँ रक्षा के लिए पुकार रही है। पाठान्तर—इस सवैया की चौथी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'मै तृन लौ कुल कानि तजी सुवर्जा ब्रजमडल माँहि दुहाई।' सवैया मोहन के मन की सब जानति जोहन के मोहि मग लियो मन। मोहन सुन्दर आनन चन्द ते कु जनि देख्यौ मै स्याम सिरोमन ॥ ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हौ बन। कैसी करौ रसखानि लगी जक री पकरी पिय के हित को पन ॥७२॥ शब्दार्थ—जोहन के मग-दृष्टि के द्वारा। सिरोमन =शिरोमणि। जक = धुन। हित को =प्रेम का। पन =प्रण। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! कृष्ण के मन की सारी बाते मैं जानती हूँ। उसने दृष्टि के द्वारा मेरा मन अपने वश मे कर लिया है। मैने उस मोहने वाले और चन्द्रमा से सुन्दर मुख वाले श्याम शिरोमणि को जब से कुज मे देखा है, तभी से मेरे नेत्रो ने लोक-लज्जा और कुल की मर्यादा छोड़ दी है और मै उनकी खोज मे बन-बन घूम रही हूँ। रसखान कहते है कि हे सखि ! अब मै क्या करूँ मुझे उनसे मिलने की धुन लगी हुई है और मै उस प्रियतम के प्रेम के प्रण मे बँधी हुई हूँ। विशेष—द्वितीय पंक्ति मे प्रतीप अलकार। सवैया लोक की लाज तज्यौ तबहिं जब देख्यौ सखी ब्रजचन्द सलौने। खजन मीन सरोजन की छबि गजन नैन लला दिन होनो॥ हेर सम्हारि सकै रसखानि सो कौन तिया वह रूप सुठोनो। भौंहन कमान सो जोहन को सर बेधत प्राननि नन्द को छोनो ॥७३॥ शब्दार्थ—सलौनो = सुन्दर। सरोज =कमलो । गजन =खंडित ।,