रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ रसखान-ग्रन्थावली
हेरै = देखकर । सुठोनो = सुन्दर । जोहन = देखना । छोनी = पुत्र । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा उसके प्रति अपने आकर्षण का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मैंने सुन्दर कृष्ण को देखा है, तभी से मैंने लोकलाज त्याग दी है, अर्थात् निर्भय होकर उसके प्रेम मे डूब गई हूँ । कृष्ण के दिन-दिन शोभा धारण करने वाले नेत्र ऐसे सुन्दर हैं कि वे अपनी सुन्दरता के कारण खजन, मछली और कमलो की शोभा को भी खंडित कर देते है । ब्रज मे ऐसी कौन-सी स्त्री है जो उसकी शोभा देखकर स्वय को सम्भाल सके, अर्थात् उससे प्रेम न करने लगे ? उसकी भौंह कमान के समान है, चितवन बाण के समान हैं । भौंह-रूपी कमान पर चितवन-रूपी बाण चढाकर वह नन्द-पुत्र कृष्ण सभी के प्राणो को बींध देता है । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे रूपक अलकार है । मुसकान माधुरी सवैया वा मुख की मुसकानि भटू अँखियानि ते नेकु टरै नहिं टारी । जो पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ॥ दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ वजमारी ॥ प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥७४॥ शब्दार्थ—भटू = सखी । वजमारी = कठोर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुस्कान मेरी आँखो से हटाने पर भी नही हटती, अर्थात् हर समय मुझे वह मुस्कान याद आती रहती है । यदि मेरी पलके क्षणभर के लिए लग जाती है, तो वह पल ही पल में पुकारो को पुकारने लगती है । दूसरी मुसीबत यह है कि इन आँखो ने कठोर नियम धारण कर लिया है । रसखान कहते है कि सोचने-समझने पर भी यह पता नही लगता कि यह प्रेम की आदत है अथवा भोग-विद्या । विशेष—सदेह अलकार । सवैया कातिग क्वार के प्रात ही प्रात सरोज किते विकसात निहारे । डीठि परे रतनागर के दरके बहु दाड़िम विम्ब त्रिचारे ॥