रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
२०४ रसखान-ग्रन्थावली
हेरै = देखकर । सुठोनो = सुन्दर । जोहन = देखना । छोनी = पुत्र । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा उसके प्रति अपने आकर्षण का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मैंने सुन्दर कृष्ण को देखा है, तभी से मैंने लोकलाज त्याग दी है, अर्थात् निर्भय होकर उसके प्रेम मे डूब गई हूँ । कृष्ण के दिन-दिन शोभा धारण करने वाले नेत्र ऐसे सुन्दर हैं कि वे अपनी सुन्दरता के कारण खजन, मछली और कमलो की शोभा को भी खंडित कर देते है । ब्रज मे ऐसी कौन-सी स्त्री है जो उसकी शोभा देखकर स्वय को सम्भाल सके, अर्थात् उससे प्रेम न करने लगे ? उसकी भौंह कमान के समान है, चितवन बाण के समान हैं । भौंह-रूपी कमान पर चितवन-रूपी बाण चढाकर वह नन्द-पुत्र कृष्ण सभी के प्राणो को बींध देता है । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे रूपक अलकार है । मुसकान माधुरी सवैया वा मुख की मुसकानि भटू अँखियानि ते नेकु टरै नहिं टारी । जो पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ॥ दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ वजमारी ॥ प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥७४॥ शब्दार्थ—भटू = सखी । वजमारी = कठोर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुस्कान मेरी आँखो से हटाने पर भी नही हटती, अर्थात् हर समय मुझे वह मुस्कान याद आती रहती है । यदि मेरी पलके क्षणभर के लिए लग जाती है, तो वह पल ही पल में पुकारो को पुकारने लगती है । दूसरी मुसीबत यह है कि इन आँखो ने कठोर नियम धारण कर लिया है । रसखान कहते है कि सोचने-समझने पर भी यह पता नही लगता कि यह प्रेम की आदत है अथवा भोग-विद्या । विशेष—सदेह अलकार । सवैया कातिग क्वार के प्रात ही प्रात सरोज किते विकसात निहारे । डीठि परे रतनागर के दरके बहु दाड़िम विम्ब त्रिचारे ॥
व्याख्या भाग २०५ लाल सु जीव जिते रसखानि ते रगनि तोलनि मोलनि भारे । राधिका श्रीमुरलीधर की मधुरी मुसकानि के ऊपर वारे ॥७५॥ शब्दार्थ—कातिग=कातिक । सरोज=कमल । विकसात=खिलते हुए । रतनागर=रत्नो के भण्डार । दरके=फटे हुए । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से श्रीकृष्ण और राधा की मुस्कान का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैने कातिक और क्वार मास के प्रातःकाल मे कितने ही खिलते हुए कमलो को देखा है। अनेक रत्नो के भण्डार देखे है तथा फटे हुए अनेक अनारो के बिम्बो पर भी विचार किया है, पर राधा और कृष्ण की मुस्कान की शोभा के आगे ये नगण्य ही सिद्ध हुए है। रसखान कहते है कि इस भूमडल पर जितने भी प्राणी है उनसे कृष्ण के प्रेम की तोल और मूल्य भारी ही है । ये सब राधा और कृष्ण की मधुर मुस्कान के ऊपर मै न्योछावर करती हूँ । विशेष—तृतीय पंक्ति मे जीव का अर्थ बधूक भी किया जा सकता है ! सवैया बक विलोचन है दुख-मोचन दीरघ रोचन रं ग भरे है। घूमत बारुनी पान किये जिमि झूमत आनन रूप ढरे है ।। गडनि पै झलकै छवि-कुडल नागरि-नैन बिलोकि भरे है। बालनि के रसखानि हरे मन ईषद हास के पानि परे है ॥७६॥ शब्दार्थ — रोचन=लाल । वारुनी=शराब । नागरि-नैन=युवतियो के नेत्र । विलोकि=देखकर । ईषद=थोडी-सी । पानि परे है=हाथो मे पड गए है, वशीभूत हो गए है । अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी से अपने-प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण के बॉके नेत्र दुख को दूर करने वाले है, विशाल है और लाल र ग (प्रेम) से भरे हुए है । वे ऐसे प्रतीत होते है मानो वे मुख के सौन्दर्य की शराब पीकर झूम रहे हो । उनके कपोलो पर कु डलो की शोभा छलकती है जिसे देखकर ब्रज की युवतियो के नेत्र उस शोभा मे उलझ जाते है । रसखान कहते है कि कृष्ण की थोड़ी-सी मुस्कराहट मे ही ब्रज-बालाओ के मन उस मुस्कराहट के वशीभूत हो गए हैं, अर्थात् उस मुस्कान के कारण ब्रज-वालाये कृष्ण के प्रेम मे बंध गई है ।
३०६ रसखान-ग्रन्थावली कवित्त अब ही खरिक गई गाइ के दुहाइवे कों, बावरी ह्वै आई डारि ढोहनी यो पानि की । कोऊ कहै छरी कोऊ मौन परी डरी कोऊ, कोऊ कहै मरी गति हरी अँखियानि की ॥ सास व्रत ठानै नन्द बोलत सयाने धाड़, दौरि-दौरि मानै-जानै खोरि देवतानि की । सखी सब हँसै मुरझानि पहिचानि कहूँ, देखी मुसकानि वा अहीर रसखानि की ॥७७॥ शब्दार्थ—पानि = हाथ ! सयाने = जादू-टोना करने वाले । खोरि = मनौती । अर्थ—कृष्ण को देखकर कोई गोपी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी है । इसी का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी- अभी वह गौशाला मे गाय का दूध निकालने के लिए गई थी, लेकिन वह अपने हाथ के दूधपात्र को फेंक कर पागल होकर वापिस आ गई है। उसकी अवस्था को देखकर कोई तो यह कहती है कि किसी ने इसको छल लिया है, कोई कहती है कि यह स्तब्ध हो गई है, कोई कहती है कि यह डर गई है, कोई कहती है कि यह मर गई है और कोई कहती है कि इसकी आँखो की ज्योति ही नष्ट हो गई है । उसको अच्छा करने के लिए सासु अनेक प्रकार के व्रतो को करने का सकल्प करती है, नन्द दौड-दौड़कर सयानो को बोलकर लाती है और जाने-अनजाने देवताओ की मनौती करती है। सारी सखियाँ उसकी मूर्छा को पहिचान कर हँसती हैं और कहती है कि इसने आनन्द-सागर कृष्ण की कही मुस्कराहट को देख लिया है और यह उसी का प्रभाव है । सवैया मैन-मनोहर वन वर्जे सु सजे तन सोहत पीत पटा है । याँ दमकै चमकै झमकै दुति दामिनि की मनो स्याम घटा है । ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है । रसखानि महा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥७८॥ शब्दार्थ—मैन = कामदेव । पटा = वस्त्र । दामिनि = बिजली । घटा =
व्याख्या भाग २०७ गेंद । कटा = नष्ट । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा तज्जन्य प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह कामदेव के समान मधुरवाणी बोलता है । उसके शरीर पर सुन्दर पीला वस्त्र सुशोभित है उसके शरीर की कांति इस प्रकार चमकती और झमकती है मानो काले बादल मे बिजली चमक रही हो । हे सजनी ! कृष्ण अटारी पर चढकर अपनी लाल गेंद को फेकते है । रसखान कहते है कि उसके मुख का भारी सौन्दर्य और उसकी मुस्कान कुल लज्जा को नष्ट कर देती है अर्थात् उसकी मुस्कराहट को देखकर ब्रज ललनाये उसके प्रेम मे इतनी आबद्ध हो जाती हैं कि वे अपने कुल की मान-मर्यादा का भी ध्यान नही रखती । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार । सवैया जा दिन ते मुसकानि चुभी चित ता दिन ते निकसी न निकारी । कुंडल लोल कपोल महा छवि कुंजन ते निकस्यौ सुखकारी ॥ हौ सखि आवत ही डगरे पग पैड तजी रिझई बनवारी । रसखानि परी मुसकानि के पाननि कौन गनै कुलकानि बिचारी ॥७६॥ शब्दार्थ—लोल = चंचल । डगरे = मार्ग मे । पैड़ = मार्ग । पाननि = हाथो मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से कृष्ण की मुस्कराहट मेरे मन मे चुभी है उस दिन से वह निकाले से नही निकलती । वह सुख देने वाला कृष्ण चंचल कुण्डलो को अपने कपोलो पर हिलाते हुए तथा अत्यन्त सौन्दर्य धारण किए हुए कुंजो से निकला था । हे सखि ! उसके मार्ग पर आते ही अर्थात् उसे देखते ही मैने अपना मार्ग छोड़ दिया और मै उस पर पूर्ण रूप से रीझ गई । अब तो मैं आनन्द-सागर कृष्ण की मुस्कान के हाथो मे पड गई हूँ । ऐसी स्थिति मे बेचारी कुल मर्यादा की गणना ही क्या है ? अर्थात् ऐसी स्थिति मे कुल-मर्यादा नही रह सकती । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है । पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
२०८ रसखान-ग्रन्थावली 'जा दिन ते मुसकान चुभी उर ता दिन ते जु भई विजनारी।' सवैया काननि दै अँगुलि रहिवो जबही मुरली धुनि मन्द बजैहै। मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तौ गैहै॥ टेरि कहौ सिगरे ब्रज लोगनि काल्हि कोऊ मु कितौ समझैहै। माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै॥८०॥ शब्दार्थ - काननि = कानो मे। अर्थ - कृष्ण के प्रति अपने अनुराग का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि जब कृष्ण की मन्द-मन्द मुरली बजती है, तब चाहे कोई मेरे कानो मे अँगुरी दे दे, अर्थात् मुझे वह तान न सुनने दे, चाहे कृष्ण अटारी पर चढकर मोहने वाली तानो के साथ गौचारण के गीत गायें; मैं सारे ब्रज के लोगो से पुकार-पुकार कर इस बात को कहती हूँ कि कल चाहे कोई कितना ही समझाये, परन्तु हे सखि! मुझसे कृष्ण के मुख की मुस्कान सम्भाली नही जाती, अर्थात् मैं कृष्ण के प्रेम मे बहुत ही व्याकुल और उन्मत्त. हो गई हूँ। विशेष - १. अन्तिम पंक्ति मे 'न जैहै' का वीप्सा-युक्त प्रयोग गोपी की मनोव्यथा को द्विगुणित कर रहा है। १. 'काननि दै अँगुरी रहिवो' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है। तुलना - 'अब ही सुधि भूली हौ मेरी भटू, भ्रमरो जनि मीठी सी तानन मे। कुल-कानि जो अपनी राखी चहौ, दै रहौ अँगुरी दोउ कानन मे।'
- निवाज सवैया आजु सखी नन्द-नन्दन की तकि ठाढी हो कुंजन की परछाही। न विसाल की जोहन को सब भेदि गयी हियरा जिन माही॥ घाइल घूमि सुमार गिरी रसखानि सम्हारति अँगनि जाही। एते पै वा मुसकानि की डौड़ी बजी ब्रज मै अबला कित जाती। ८१॥ शब्दार्थ - हियरा जिय माही = हृदय के भी हृदय मे। घूमि = चक्कर
व्याख्या भाग २०६ खाकर। सुमार = भयंकर मार। डोरी = ढोल। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से कहती है कि हे सखि ! आज मैंने कृष्ण को कुंजो की छाया मे खडे हुए देखा था। उसके विशाल नेत्रो का दृष्टि-रूपी बाण मेरे हृदय के हृदय को भी छेद गया। उस बाण की भयंकर मार से मै घायल होकर तथा चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पडी और मुझे अपने अंगो को भी संभालने का होश नही रहा। इतनी सी घटना घटित होने पर ही उसकी मुस्कान का, हम दोनो के प्रेम का, ढोल समूचे व्रज मे बज गया। अब तुम्ही बताओ कि हम जैसी अबलाएं इस व्रज को छोडकर और कहाँ जाये। दोहा ए सजनी लोनो लला, लखौ नन्द के गेह। चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥८२॥ शब्दार्थ—लोनो=सुन्दर। लखौ=देखा। गेह=घर। हर=हरण कर ली, प्रसन्न हो गई। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छबि का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सजनी ! मैंने नन्द के घर मे सुन्दर कृष्ण को देखा। उसने जब मधुर मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा तो उसने मेरे शरीर की सारी सुधि का हरण कर लिया; अथवा मेरा रोम-रोम प्रसन्नता से खिल उठा। विशेष—अन्तिम चरण मे श्लेष अलंकार है। कृष्ण-सौन्दर्य दोहा जोहन नन्दकुमार को, गई नन्द के गेह। मोहिं देखि मुसकाइ कै, वरस्यौ मेह सनेह ॥८३॥ शब्दार्थ—जोहन=देखने के लिए। गेह=घर। सनेह=प्रेम। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण को देखने के लिए मै नन्द के घर गई थी। मुझे देखकर कृष्ण मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट से प्रेम का मेह बरसा ! अर्थात् मै उसके प्रेम मे आबद्ध हो गई। विशेष—रूपक अलंकार।
२१० रसखान-ग्रन्थावली सवैया मोरपखा सिर कानम कुण्डल कुंतल सो छवि गंडनि छाई। वंक विसाल रसाल विलोचन है दुखमोचन मोहन माई। आली नवीन महा घन सो तन पीट घटा ज्यौ पटा बनि आई। हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई ॥८४॥ शब्दार्थ-रसाल= आनन्द देने वाली। पटा = वस्त्र। टोना = जादू। ठगौरी = ठग विद्या। अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के सिर पर मोरपखो का मुकुट और कानो मे कुण्डल सुशोभित है। उनके केशो की शोभा उनके कपोलो पर बिखरी हुई है। उनकी वक्र दृष्टि आनन्द देने वाली और विशाल है। वह दुख को दूर करने वाली तथा मन को मोहने वाली है। हे सखि ! उनका श्याम शरीर नवीन विशाल वादल के समान है जिस पर पीले वस्त्र की शोभा बहुत ही प्रभावशाली है। रसखान कहते है कि मैं उनकी शोभा को देखकर स्तब्ध-सी रह गई और उसने मेरे ऊपर कुछ जादू-सा करके मुझे ठग लिया। विशेष-तृतीय पक्ति मे उपमा अलकार है। सवैया जा दिन ते वह नन्द को छोहरा या वन धेनु चराइ गयौ है। मोहिनी ताननि गोधन गावत वेनु वजाइ रिझाइ गयौ है। वा दिन सो कछु टोना सो कै रसखानि हिये मैं समाइ गयौ है। कोऊ न काहू की कानि करै सिगरो व्रज वीर । विकाइ गयौ है ॥८५॥ शब्दार्थ-छोहरा = पुत्र। गोधन = गोचारण के गीत। टोना = जादू। कानि करै = लज्जा करती है। वीर = सखी। अर्थ-एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से वह नन्द-पुत्र कृष्ण इस वन मे गाये चरा कर गया है, मधुर तानो के साथ बंशी बजाकर तथा गोचारण के गीत गाकर रिझा गया है, उस दिन से कुछ जादू-सा करके वह आनन्द-सागर कृष्ण हृदय मे समा गया है। इसलिए यहाँ पर कोई स्त्री भी किसी की लज्जा नही करती। वास्तविकता तो यह है कि सारा व्रज ही उसके हाथों विक गया है; अर्थात् व्रज के सब नर-नारी पूर्ण- रूप से कृष्ण के वश मे हो गये हैं, उसे प्रेम करने लगे हैं।
व्याख्या-भाग २११ पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'ऐ सजनी वह नन्द को साँवरो या वन धेनु चराइ गयौ है।' सवैया आयौ हुतौ नियरै रसखानि कहा कहौँ तू न गई वहि ठैया । या ब्रज मे सिगरी बनिता सब बारति प्राननि लेति बलैया । कोऊ न काहु की कानि करै कछु चेटक सो जु कियौ जदुरैया । 'गाइ' गौ तान जमाइ गौ नेह रिझाइ गौ प्रान चराइ गौ गैया ॥८५॥ शब्दार्थ—आयौ हुतौ=आया था। रसखानि=आनन्द-सागर कृष्ण । ठया = स्थान । सिगरी=सब । बनिता=स्त्रियाँ । कानि करै=लज्जा करती है। चेटक=जादू। जदुरैया—कृष्ण । नेह=स्नेह, प्रेम । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज आनन्द- सागर कृष्ण पास आया था। क्या कहती हो कि तुम उस स्थान पर नही गई । इस ब्रज मे सारी स्त्रियाँ कृष्ण के ऊपर अपने प्राणो को न्यौछावर करती है और उसकी बलैया लेती है। यहाँ पर सभी कृष्ण के प्रेम मे इतनी उन्मत्त हैं कि कोई किसी की लज्जा नही करती । इस प्रकार का कुछ जादू-सा कृष्ण ने सबके ऊपर कर दिया है। वह कृष्ण तान बजाकर, हृदय मे प्रेम उत्पन्न करके, प्राणो को रिझाकर और गायो को चराकर चला गया । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे विविध भावो की सुन्दर योजना है। सवैया कौन ठगौरी भरी हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रंग-भीनी । तौन सुनी जिनही तिनही तबही तित साज बिदा करि दीनी । घूमै घरी घरी नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी । याँ ब्रज-मण्डल मे रसखानि सु कौन भटू जू लटू नहिं कीनी ॥८७॥ शब्दार्थ—ठगौरी भरी=जादू से भरी हुई । रंग-भीनी=प्रेम से पूर्ण । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! न जाने कृष्ण ने किस जादू से भरी हुई तथा प्रेम से परिपूर्ण बाँसुरी बजाई कि जिस भी गोपी ने उसे सुना, उसने भी उसी समय अपनी लाज को त्याग दिया, अर्थात् वह लाज त्याग कर अपने घर से बाहर निकल पड़ी । हे सुन्दर तथा प्रवीण सखि ! तब से सभी
२१२ रसखान-ग्रन्थावली गोपियाँ प्रत्येक समय नन्द के दरवाजे का चक्कर काटने लगीं। हे सखि ! इस ब्रज मे कोई भी ऐसी युवती नहीं है जिसे आनन्द-सागर कृष्ण ने अपने प्रेम के वश मे नहीं कर लिया है। विशेष — अन्तिम पंक्ति मे 'लटू नहीं' बौनी मुहावरे का भावमय प्रयोग है। तुलना — १. किती न गोकुल कुल-वधू, किहि न काहि मिस दीन । कौने तजी न कुल गली, है मुरली सुर-लीन ॥' —बिहारी २ 'सखि मोहि न मोहन को मुख देषि, सु ऐसी धौ गोकुल को कुल की ।' —ब्रह्म कवि सवैया बांकी धरै कलगी सिर ऊपर बांसुरी-तान कटै रस बीर के । कुण्डल कान लसै रसखानि बिलोकन तीर अनंग तुनीर के । डारि ठगोरी गयो चित चोरि लिए हैं सबै सुख सोखि सरीर के । जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला बे अहीर के ॥८८॥ शब्दार्थ — कलगी — मुकुट । अनंग = कामदेव । सोखि = सुखाना । अर्थ — कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वह अपने सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट धारण किये हुए है, बांसुरी मे वह आनन्द से भरी हुई तान बजाता है । उसके कानो मे कुण्डल शोभायमान है जिन्हे देखकर कामदेव के तूणीर के बाणो-जैसा प्रभाव पडता है, अर्थात् मन काम-वासना के वशीभूत हो जाता है । ऐसा कृष्ण मेरे ऊपर जादू डालकर मेरा मन चुरा कर ले गया है और उसने मेरे शरीर के सारे सुखो को नष्ट कर दिया है । फिर वह कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहती है कि हे अहीर के पुत्र ! इसमे तुम्हारी कौनसी वीरता है, जो तुम मुझ अबला पर काम-बाण चलाते हो । विशेष — १. 'बे' शब्द का प्रयोग अत्यधिक आत्मीयता का सूचक है । २. 'अबला' शब्द का सार्थक प्रयोग है, अतः परिकर अलंकार है ।
व्याख्या भाग २१३ सवैया कौन की नागरि रूपकी आगरि जाति लिएँ सँग कौन की बेटी । जाको लसै मुख चंद-समान सु कोमल अँगनि रूप-लपेटी ॥ लाल रहौ चुप लागि है डीठि सु जाके कहूँ उर बात न मेरी । टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ॥ ८६ ॥ शब्दार्थ—आगरि=भंडार । लागि है डीठि=दृष्टि लग जाना । बात= प्रणय करना । टटकार=तुरन्त, तत्काल । कारिख-पेटी=कालिख का सन्दूक । अर्थ—जाती हुई राधा को देखकर कृष्ण एक गोपी से पूछते है कि यह युवती जो सौन्दर्य का भंडार है, जिसका मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है, सम्पूर्ण कोमल अगो मे छवि लिपटी हुई है, किसकी स्त्री है, ? किसके साथ जा रही है ? किसकी पुत्री है ? यह सुनकर गोपी कहती है कि हे लाल ! चुप रहो । इसके हृदय को अभी तक प्रणय की हवा नहीं लगी है, अतः मुझे डर है, कि कही तुम्हारी दृष्टि इसे न लगा जाये । रसखान कवि कहते है कि उसे टोकते ही वह तत्काल रुक गई और भय से इतनी स्याह पड गई मानो वह कालिख की सन्दूक बन गई हो । विशेष—उपमा, उत्प्रेक्षा अलकार । सवैया मकराकृत कुंडल गूँज की माल के लाल लसै पग पॉवरिया । बछरानि चरावन के मिस भावतो दै गयौ भावती भाँवरिया ॥ रसखानि बिलोकत ही सिगरी भईँ बावरिया ब्रज-डॉवरिया । सजनी इहिँ गोकुल मैंँ विष सो बगरायौ हे नद के साँवरिया ॥ ६० ॥ शब्दार्थ—मकराकृत =मकरकी आकृति वाले । पॉवरिया=जूती । मिस= बहाने से । भावतो=प्रिय । भावती = सुहावनी । ब्रज—डॉकरिया=ब्रज- बलाएँ । बगरायौ है=बिखेर दिया है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानों से मकर की आकृति वाले कुं डल गले मे गुँजो की माला और पैरों मे जूतियाँ सुशोभित थी । वह प्रिय बछडो को चराने के बहाने से सुहावनी भाँवर दे गया । रसखान कहते हैं कि उसे देखते ही सारी ब्रज-वालाए पागल होगई । हे सजनी ! ऐसा प्रतीत होता है कि नद कुमार कृष्ण इस गोकुल मे विष बिखेर गया
२१४ रसखान-ग्रन्थावली
है, जिसके कारण सभी व्रज-बालाएँ व्याकुल हैं । विशेष—हेतूत्प्रेक्षा अलकार । रूप-प्रभाव सवैया नवरंग अनंग भरी छवि सौ वह मूरति आँखि गडी ही रहै । बतिया मन की मन ही मै रहै घटिया उर वीच अडी ही रहै ॥ तबहूँ रसखानि सुजान अली नलिनी दल बूँद पडी ही रहै ॥ जिय की नहिँ जानत हौ सजनी रजनी अँसुवान लडी ही रहै ॥ ६१ ॥ शब्दार्थ—नवरग=यौवन । अनग=कामदेव । घटिया=प्रेम की घाते । रजनी=रात । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का यौवन कामदेव की शोभा से भरा हुआ है; अर्थात् उनका रूप अत्यन्त मन मोहक है। उनकी यह मन मोहक-मूर्ति सदैव आँखो मे समाई रहती है। उन्होने जो मुजसे प्रेम भरी बाते की थी, वे मन-ही मन रह गई है; अर्थात् मैं किसी से उन्हे कह नही पाती । प्रेम की घाते हृदय के बीच अडी हुई है। रसखान कहते है कि हे सखि ! फिर भी नलिनी के समूह पर बूँदे पडी रहती है। हे सजनी ! मेरे मन पर क्या बीत रही हैं, इसे कोई नही जानता । मेरी आँखो मे सारी रात आँसुओ की लडी रहती है, अर्थात् मैं रातभर कृष्ण को स्मरण करके हरती रहती हूँ । विशेष—१ रूप-प्रभाव का सजीव वर्णन है। २ वियोग-वर्णन परम्परामुक्त है। सवैया मैन मनोहर ही दुख ददन है सूख क दन नद को नदा । वक विलोचन की अवलोकनि है दुख योजन प्रेम को फदा ॥ जा को लखै मुख रूप अनूपम होत पराजय कोटिक चदा । हौ रसखानि विकाउ गई उन मोल लई सजनी सुखबन्दा ॥ ६२ ॥ शब्दार्थ—मेन=कामदेव । दुखो को दूर करने वाले । सुख क दन=सुख देने वाले । नद को नदा=नन्द पुत्र कृष्ण । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा और तज्जन्य प्रभाव
व्याख्या भाग २१५ का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह नदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी अधिक मनोहर है, दुखो को दूर करने वाला है, सुख देने वाला है । उसका वक्र दृष्टि से देखना दुखो को दूर करके प्रेम के फंदे मे बाँध लेता है । कृष्ण का मुख इतना सुन्दर है कि उसे देख कर करोड़ो चन्द्रमा पराजित हो जाते है ; अर्थात् उसके मुख की शोभा करोडो चन्द्रमाओ की शोभा से भी बढकर है । हे सजनी ! मैं तो सुख देन वाले कृष्ण ने मोल ले ली हूँ और मै उनके हाथों मे विक भी गई हूँ । अर्थात् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो गई हूँ । सवैया सोहत है चंदवा सिर मोर के तैसिय सुन्दर पाग कसी है । तैसिय गोरज भाल विराजति जैसी हिये वनमाल लसी है ॥ रसखानि बिलोकत बौरी भई दृगमू दि कै ग्वालि पुकारि हसी है । खोलि री नैननि, खोली कहा वह मूरति नैनन माँझ बसी है ॥ ६३ ॥ शब्दार्थ—गोरज = गोओ के द्वारा उडाई गई धूल । लसी है = सुशोभित है । बौरी = पागल । अर्थ — कोई गोपी कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिस प्रकार कृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट सुशोभित है, वैसे ही उनके सिर पर सुन्दर पगडी भी सुशोभित है । वैसे ही उनके माथे पर गोरज तथा हृदय पर बनमाल शोभा प्राप्त कर रही है। हे सखि ! मैं तो उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर पागल ही हो गई । यह कहकर वह गोपी अपने नेत्रो को बन्द कर तथा करुण भाव को प्रकट करने वाले शब्दो का उच्चारण करके हसी पढी । इस घटना को देखकर उसकी सखी ने कहा—अरी ! आँखें तो खोल । उसने उत्तर दिया—मै आँखे नही खोल सकती, क्योकि उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति मेरी आँखो मे ही बसी हुई है । यदि आँखे खोल दी तो डर लगता है कि कहीं वे उनमे से निकल न जाये । विशेष —अन्तिम पक्ति मे गोपी नैन नही खोलती । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि स्त्री यह नही चाहती कि जिससे वह प्रेम करती है, उसे अन्य स्त्री भी प्रेम करे । उसे विश्वास है कि यदि उसकी आँखो मे बसी हुई कृष्ण की छवि को उसकी सखी ने देख लिया तो वह अवश्य उनसे प्रेम
२१६ रसखान-ग्रन्थावली करने लगेगी । इसीलिए वह वह अपनी आंखो को नही खोलती । सवै या सुनि री ! पिय मोहन की बतियाँ अति ढीठ भयौ नहिं कानि करै । निसि वासर औसर देत नही छिनही छिन द्वार ही आनि अरै ॥ निकसौ मति नागरि डौंडी बजी ब्रज मंडल मैं यह कौन भरै । अब रूप की दौर परी रसखानि रहै तिय कोऊ न माँझ घरै ॥६४॥ शब्दार्थ—पिय = प्रिय । ढीठ = धृष्ट । कानि = लज्जा । निसि वासर = रात-दिन । रौर = शोर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सुनो, कृष्ण की बाते अत्यन्त प्रिय होती है, पर वह बहुत धृष्ट है और किसी भी प्रकार की लज्जा नही करता । वह मुझे कभी भी अवसर नही देता, बल्कि रात-दिन प्रत्येक क्षण मेरे द्वार पर आकर अड़ जाता है । हे नारियो ! घर से बाहर मत निकलो, क्योकि समूचे ब्रज मे कृष्ण की धृष्टता का ढोल बज रहा है, अत ब्रज मे नारियो को अपने दिन काटने कठिन हो रहे है । रसखान कहते है कि अब तो सारे ब्रज मे कृष्ण के रूप का शोर मचा हुआ है, इसीलिए सारी स्त्रियाँ उसे देखने को इतनी उत्सुक रहती है कि कोई भी अपने घर मे नही ठहरती । सवैया रंग भयौ मुसकात लला निकस्यौ कल कुन्जन ते सुखदाई । मै तबही निकसी घर ते तकि नैन बिसाल की चोट चलाई ॥ घूमि गिरी रसखानि तबै हरिनी जिमि बान लगै गिरी जाई । टूटि गयौ घर को सब बंधन छूटिगौ आरज लाज वडाई ॥ ६५ ॥ शब्दार्थ—रंग = प्रेम । कल = सुन्दर । आरज-लाज = आर्य धर्म की लज्जा । अर्थ —कृष्ण से भेट होने पर गोपी की क्या दशा हुई, इसी का वर्णन करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! जब प्रेम से मुसकराता हुआ कृष्ण सुख देने वाले सुन्दर कुंजन मे बाहर निकला तो सयोग से मैं भी तभी अपने घर से निकली । मुझे देख कर उसने मुझ पर अपने विशाल नेत्रो से चोट चलाई । मै उस चोट को सहन न कर सकी और जिस प्रकार बाण लगने पर हिरनी चक्कर खा कर पृथ्वी पर गिर पडती है, उसी प्रकार मै भी अपनी
व्याख्या भाग २१७ सुधि-बुधि भूल कर पृथ्वी पर गिर पडी । घर की मर्यादा के सारे बंधन टूट गये और आर्य धर्म की लज्जा का बडप्पन भी छूट गया; अर्थात् मैं अपने न्वंश की मर्यादा और नारी-सुलभ लज्जा को त्याग कर कृष्ण की ओर देखती रही। सवैया खंजन नैन फँदे पिंजरा छबि नाहि रहै थिर कैसे हूँ भाई। छूटि गई कुलकानि सखी रसखानि लखी मुसकानि सुहाई ॥ चित्र कढे से रहे मेरे नैन न बैन कढ़े मुख दीनी दुहाई। कैंसी करौ कित जाऊँ अली सब बोलि उठैं यह बावरी आई ॥ ६६ ॥ शब्दार्थ — खंजन नैन = खंजन रूपी नेत्र । थिर — स्थिर । कुलकानि = कुल की मर्यादा। कढे से = अंकित से। अर्थ — कोई गोपी अपनी प्रेमावस्था का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि मेरे खन्जन रूपी नेत्र कृष्ण के शोभा रूपी पिंजडे मे बन्दी हो गये हैं। हे सखि ! ये किसी भी प्रकार स्थिर नही रहते। बार-वार बरबस कृष्ण की छवि को देखने की लालसा मे उसी की ओर दौडते रहते है। हे सखि ! जब से मैने आनन्द सागर कृष्ण की मनोहर मुस्कराहट देखी है, तबसे मैने अपने कुल की मर्यादा को भी छोड दिया है। मेरे ये नेत्र, सदैव अपलक रहने के कारण, चित्र मे अंकित से बने रहते है। प्रयत्न करने पर भी मुख कोई शब्द नही निकलता। हे सखि ! तुम्ही बताओ कि मैं क्या करूँ, किधर जाऊँ, क्योकि मै जिधर जाती हूँ उसी ओर लोग कहते है कि वह पगली आ गई है। विशेष — प्रेमावस्था का सजीव एवं मार्मिक चित्रण है। कुंज लीला सवैया कु जगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ भटभेरो । माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूढि फिरै नहि फेरो ॥ डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डारयौ है प्रेम को फंद घनेरो । कैंसी करौ अब क्यो निकसो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ॥ ६७ ॥ शब्दार्थ — अली = सखी । ढोटा = कृष्ण से तात्पर्य है। भटभेरो = मुठभेड़
२१८ रसखान-ग्रन्थावली अचानक मिलना। बूडि = डूबना। डोरि लियो = बाँध लिया। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से मिल कर गई है। उसी का वर्णन करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! मैं आज प्रातः जब कुंज गली से निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुसकान में मेरा मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुसकान की छवि पर से हटाने पर भी नही हटा। उस मुसकान ने मेरे नयनो को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फन्दा डाल दिया। तुम्ही बताओ, अब मैं क्या करूँ। मेरे चित्त में बसा हुआ कृष्ण कैसे बाहर निकल सकता है ? उस आनन्द सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने मेरे सारे शरीर को घेर लिया है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण के साथ हुआ मिलन और तज्जन्य सुख भुलाने से भी नही भुलाया जा रहा है। सोरठा देख्यौ रूप अपार, मोहन सुन्दर स्याम को। वह ब्रजराज कुमार, हिय जिय नैननि में बस्यौ ॥ ६८ ॥ शब्दार्थ—मोहन = मोहने वाला। हिय-हृदय। जिय = मन। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि मैंने मोहने वाले सुन्दर कृष्ण का जब से अपार रूप देखा है, तबसे वह ब्रजराज कुमार मेरे हृदय में, मन में और आँखो मे बसा हुआ है। नटखट कृष्ण कवित्त अन्त ते न आयो याही गाँवरे को जायौ, माई बाप रे जिवायौ प्याइ दूध वारे वारे को। सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै, लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को। मैया की सौं सोच कछू मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को। यहै दुख भारी गहै उमर हमारी माँझ, नगर हमारे ग्वाल वगर हमारे को ॥ ६६ ॥
व्याख्या भाग २१६ शब्दार्थ — अन्त मे = और किसी जगह से । गाँवरे को = गाँव का ही । लोचन = आँख । सौ — सौगन्ध । चीरि = फाडना । वगर = घर । अर्थ — कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कह रही है कि हे कृष्ण !' तुम और किसी जगह से नही आये हो । तुम्हारा जन्म हमारे इसी गाँव मे हुआ है । बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिला कर माँ बाप की तरह पाला है । उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो, तुम बचपन मे द्वार- द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखे नचा रहे हो । तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी उतारी तो । हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस के निकल जाने का और न अपने वस्त्रो के फट जाने का । हमे केवल यही दुख है कि तुम हमारे ही गाँव के और हमारे ही घर के होकर हमारा रास्ता रोक लेते हो और हमे तंग करते हो । पाठान्तर — इस कवित्त की तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'सो तो रसखान पहिचानं हू न मानत है' सवैया एक ते एक लौ कानन मै रहे ढीठ सखा सब लीने कन्हाई । आवत ही हौ कहाँ लौ कहौ कोउ कैसे सहै अति की अधिकाई ।। खायौ दही मेरो भाजन फोरयौ न छोड़त चीर दिवाएँ दुहाई । सौह जसोमति की रसखानि ते भागे मरू करि छूटन पाई ॥ १००॥ शब्दार्थ — एक तें एक लौ = एक से एक बढकर । ढीठ = शरारती । सौह = सौगन्ध । मरु करि = कठिनता से । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की दधिलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण एक से एक बढ कर शरारती साथियो को लेकर बन मे रहता है । उनकी शरारत की बाते कहाँ तक कहूँ, और कोई किस प्रकार उनकी शरारत की अति को सहन कर सकती है कि किसी भी गोपी के आते ही वे उसे तंग करने लगते है । उन्होने मेरी दही खा ली, मेरा मटका फोड दिया और अनेक प्रकार की दुहाई देने पर भी मेरे वस्त्रो को पकडे रहा । रसखान कहते है कि जब मैने उसे यशोदा जी की सौगन्ध खिलाई तो वे भागे और मै बडी कठिनता से उनसे छूट पाई ।
२२० रसखान-ग्रन्थावली सवैया आज महूँ दधि वेचन जात ही मोहन रोकि लियौ मग आयौ । माँगत दान मे आन लियौ सु कियौ निलजी रस जोवन खायौ ॥ काह कहूँ सिगरी री विथा रसखानि लियौ हसि के मुसकायौ । पाले परी मैं अकेली लली, लला लाज लियो सु कियो मनभायौ ॥१०१॥ शब्दार्थ—निलजी=लज्जा-रहित । सिगरी=सारी । विथा=व्यथा । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! आज जब मैं दही बेचने के लिए जा रही थी तो कृष्ण ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया । उसने दही का दान मागा, किन्तु उस दान के बदले मे उसने मुझे लज्जा-रहित करके यौवन रस का आनन्द लिया। हे सखि ! मैं अपनी समस्त व्यथा का क्या वर्णन करूँ, आनन्द सागर कृष्ण ने हँस-हँस कर मेरा यौवन दान लिया। मैं अकेली ही उसे मिल गई थी, अत मै कुछ कर भी नही सकती थी । उसने मेरी लज्जा ले ली और जो चाहा वही किया । विशेष—१ भावो की सम्मानित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । २. अंतिम पक्ति मे अनुप्रास अलंकार है । सवैया पहले दधि लै गई गोकुल मे चख चारि भए नटनागर पै । रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख तें सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपे डर पै । मनौ दामिनि सावन के घन मे निकसे नही भीतर ही तरपै ॥१०२॥ शब्दार्थ—चाव=आँख । मैनमई=प्रेम से परिपूर्ण । दामिनी=बिजली । अर्थ—दानलीला का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि पहले मै गोकुल मे दही ले गई । वहाँ मुझे कृष्ण मिल गये जिनसे आँखे चार हुईं । उन्होने मुझे प्रेम परिपूर्ण कर दिया और दही के दान के लिए अडकर खडे हो गये । मेरी सारी सखियाँ सिर से पैर तक अपने नीले वस्त्र को लपेटे हुए डर से काँप रही थी । वस्त्रो मे लिपटा हुआ उनका सौन्दर्य ऐसा प्रतीत होता था, मानो सावन मे उमडे हुए बादल मे से बिजली की द्युति न निकलने के कारण अन्दर ही अन्दर तडप रही हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार ।
व्याख्या भाग २२१ पाठान्तर— पहिले दधि लै गई गोकुल मे चख चार भए नटनागर पै । रसखान करी उन चातुरता कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख ते सिख लौ पट नील लपेटि लली सब भाँति कँपे डर पै । मनु दामिनी साँवन के घन मे निकसे नहि भीतर ही तरपै ॥ सवैया दानी नए भए माँगत दान सुने जु पे कंस तो बाँधे न जैहौ । रोकत हौ वन मे रसखानि पसारत हाथ महा दुख पैहौ । टूटे छरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै पुनि रेहौ । जै है जो भूषन काहू तिया को तौ मोल छलाके लला न बिकैहौ । १०३ ॥ शब्दार्थ—दानी = कर वसूल करने वाले । सुने जु पे कंस तौ बाँधे न जैहौ = यदि कंस सुन लेगा तो क्या बन्दी नही बना लिए जाओगे ? अर्थात् यह जानकर कि तुम उसकी प्रजा को तंग करते हो, कंस तुम्हे बन्दी बना लेगा । छरा = गूँजा की माला । छला = छल्ला, अँगूठी । अर्थ—दही के लिए जबरदस्ती करते हुए कृष्ण को भय दिखाती हुई कोई गोपी कहती है कि हे कृष्ण ! यह सुनकर कि तुम नये कर वसूल करने वाले अपने आप ही बन गए हो, कंस तुम्हे पकड़वा कर बन्दी बना लेगा । तुम बन मे हमारा मार्ग रोककर हमारे सामने दही के लिए हाथ फैलाते हो, इस प्रकार की याचक वृत्ति से तुम्हे बहुत अधिक दुख भोगना पड़ेगा । इस छीना-झपटी मे यदि किसी गोपी की गूँज की माला टूट गई तो उसकी क्षति-पूर्ति के लिए तुम्हारे पास जो बछड़ा आदि धन है, वह सबका सब देना पड़ जायेगा । और यदि संयोगवश किसी गोपी का कोई आभूषण टूट गया तो उसके एक छल्ले के मूल्य मे ही तुम्हे बिक जाना पड़ेगा । तुलना—'चेरी न तेरी न तेरे बबा की मै घेरी गली मे का पैर लड़ैहसौ । जो तुम चाहत चाखन माखन सो तुम माखन नेकु न पैहौ । कंस के राज मे घूम नही वरि आई बबा की सौ बूंद न देहौ । टूटैंगौ हार हजार को तौ तुम नन्द जसोदा समेत बिकैहो ॥ —अज्ञात
२२२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया छीर जौ चाहत चीर गहैं एजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ । चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ । जानति हौ जिय की रसखानि सु काहे कौ एतिक बात बढैहौ । गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्हजू नेकु न पैहौ ॥ १०४ ॥ शब्दार्थ—छीर = क्षीर, दूध । अचैहो = पीओगे । एतिक = उतनी । गोरस = दही । रस = आनन्द, इन्द्रिय, सुख । नेकुन = तनिक भी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से कह रही है कि हे कृष्ण ! तुम मेरा चीर पकड़ कर जो दूध माँग रहे हो, तो लो । देखती हूँ तुम कितना दूध पी जाओगे । चाखने के बहाने से जो मक्खन तुम माँग रहे हो तो लो और जितना चाहो उतना खालो । लेकिन मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूँ, इसलिए क्यो इतनी बढ़ा रहे हो । तुम दही के बहाने से जो इन्द्रिय-सुख चाहते हो, वह तुम्हे तनिक भी नही मिलेगा । तुलना—१. 'जो रस चाहो सो रस नाही गोरस पियहुँ अघाय ।' —सूरदास २. 'गोरस के मिस डोलती, सो रस नेकु न देइ ।' —रहीम ३. 'गोरस चाहत फिरत हौ, गोरस चाहत नाहिं ।' —बिहारी सवैया लगर छैलहि गोकुल मैं मग रोकत संग सखा ढिग तैं हैं । जाहि न ताहि दिखावत आँखि सु कौन गई अव तोसो करै हैं । हाँसी मे हार हट्यौ रसखानि जु जौ कहूँ नेकु तगा त्रुटि जै हैं । एकहि मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहि हाट बिकै हैं ॥ १०५ ॥ शब्दार्थ—लगर = प्रेमी । ढिग = पास । गई = परवाह, चिन्ता । अर्थ—गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि यह सच है कि तुम प्रेमी और छैला बनकर गोकुल में हमारा रास्ता रोक लेते हो, क्योकि तुम्हारे पास तुम्हारे बहुत से साथी हैं, लेकिन हमे अपनी चालें दिखाने की कोई जरूरत नही है, क्योकि अब तुम्हारी परवाह कोई नही करता । हे आनन्द-सागर कृष्ण
व्याख्या भाग २२३ तुमने हँसी-हँसी मे मेरा हार ले लिया है, लेकिन ध्यान रखो, यदि इसका जर सा भी धागा टूट गया तो सिर्फ इसके एक मोती के लिए तुम सारे व्रज के बाजार मे बिकते फिरोगे । सवैया काहू को माखन चाखि गयौ अरु काहू को दूध दही ढरकायौ । काहू को चीर लै रूख चढ़यौ अरु काहूको गुजघरा छहरायौ । मानै नही बरजे रसखानि सु जानियै राज इन्हें घर आयौ । आव री बूझैँ जसोमति सो यह छोहरा जायौ कि मेव मगायौ ॥ १०६॥ शब्दार्थ—ढरकायौ=बिखेर दिया । गुजछरा=गुंजो की माला । छह- रायौ=तोड़ दी । बरजे=रोकने पर मेव=लूट मार करने वाला । अर्थ—कृष्ण की शरारतो से तग आकर गोपियाँ परस्पर उपालम्भ देती हुई कहती है कि यह कृष्ण हमे बहुत तग कर रहा है। किसी का मक्खन छीनकर उसे खा लिया, किसी की दही बिखेर दी और दूध बिखेर दिया । किसी का वस्त्र लेकर पेड पर चढ गया । किसी की गुजो की माला तोड दी । रसखान कहते है कि रोकने पर भी यह अपनी आदतो से वाज नही आता । ऐसा जान पडता है कि इन्ही के घर का राज्य आ गया हो । हे सखियो ! आयो, और यशोदा जी से यह चलकर मालूम करे कि तुमने यह पुत्र उत्पन्न किया है या लूटमार करने वाला मेव । विशेष—कृष्ण जी विविध लीलाओ का भावपूर्ण वर्णन है । मुरली प्रभाव कवित्त दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ तातो, न जमायौ कर्यौ, जामन दयौ सो धर्यौ धर्यौई खटाइगौ । आन हाथ आन पाइ सबही के तब ही ते, जब ही ते रसखानि ताननि सुनाइगौ । ज्योही नर त्यौहो नारी तैसीयै तरुन वारी, कहिये कहा री सब ब्रिज विललाइ गौ । ज्योही नर त्योही नारी तैसीयै तरुन वारी, कहिये कहा री सब ब्रज बिललाइ गौ । जानियै न माली यह छोहरा जसोमति को, बाँसुरी बजाइ गौ कि विष बगराइ गौ ॥१०६॥ शब्दार्थ—तातो=गर्म । जामन=दूध को जमाने के लिए दही का जो