रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ रसखान-ग्रन्थावली
है, जिसके कारण सभी व्रज-बालाएँ व्याकुल हैं । विशेष—हेतूत्प्रेक्षा अलकार । रूप-प्रभाव सवैया नवरंग अनंग भरी छवि सौ वह मूरति आँखि गडी ही रहै । बतिया मन की मन ही मै रहै घटिया उर वीच अडी ही रहै ॥ तबहूँ रसखानि सुजान अली नलिनी दल बूँद पडी ही रहै ॥ जिय की नहिँ जानत हौ सजनी रजनी अँसुवान लडी ही रहै ॥ ६१ ॥ शब्दार्थ—नवरग=यौवन । अनग=कामदेव । घटिया=प्रेम की घाते । रजनी=रात । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का यौवन कामदेव की शोभा से भरा हुआ है; अर्थात् उनका रूप अत्यन्त मन मोहक है। उनकी यह मन मोहक-मूर्ति सदैव आँखो मे समाई रहती है। उन्होने जो मुजसे प्रेम भरी बाते की थी, वे मन-ही मन रह गई है; अर्थात् मैं किसी से उन्हे कह नही पाती । प्रेम की घाते हृदय के बीच अडी हुई है। रसखान कहते है कि हे सखि ! फिर भी नलिनी के समूह पर बूँदे पडी रहती है। हे सजनी ! मेरे मन पर क्या बीत रही हैं, इसे कोई नही जानता । मेरी आँखो मे सारी रात आँसुओ की लडी रहती है, अर्थात् मैं रातभर कृष्ण को स्मरण करके हरती रहती हूँ । विशेष—१ रूप-प्रभाव का सजीव वर्णन है। २ वियोग-वर्णन परम्परामुक्त है। सवैया मैन मनोहर ही दुख ददन है सूख क दन नद को नदा । वक विलोचन की अवलोकनि है दुख योजन प्रेम को फदा ॥ जा को लखै मुख रूप अनूपम होत पराजय कोटिक चदा । हौ रसखानि विकाउ गई उन मोल लई सजनी सुखबन्दा ॥ ६२ ॥ शब्दार्थ—मेन=कामदेव । दुखो को दूर करने वाले । सुख क दन=सुख देने वाले । नद को नदा=नन्द पुत्र कृष्ण । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा और तज्जन्य प्रभाव