रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २१३ सवैया कौन की नागरि रूपकी आगरि जाति लिएँ सँग कौन की बेटी । जाको लसै मुख चंद-समान सु कोमल अँगनि रूप-लपेटी ॥ लाल रहौ चुप लागि है डीठि सु जाके कहूँ उर बात न मेरी । टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ॥ ८६ ॥ शब्दार्थ—आगरि=भंडार । लागि है डीठि=दृष्टि लग जाना । बात= प्रणय करना । टटकार=तुरन्त, तत्काल । कारिख-पेटी=कालिख का सन्दूक । अर्थ—जाती हुई राधा को देखकर कृष्ण एक गोपी से पूछते है कि यह युवती जो सौन्दर्य का भंडार है, जिसका मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है, सम्पूर्ण कोमल अगो मे छवि लिपटी हुई है, किसकी स्त्री है, ? किसके साथ जा रही है ? किसकी पुत्री है ? यह सुनकर गोपी कहती है कि हे लाल ! चुप रहो । इसके हृदय को अभी तक प्रणय की हवा नहीं लगी है, अतः मुझे डर है, कि कही तुम्हारी दृष्टि इसे न लगा जाये । रसखान कवि कहते है कि उसे टोकते ही वह तत्काल रुक गई और भय से इतनी स्याह पड गई मानो वह कालिख की सन्दूक बन गई हो । विशेष—उपमा, उत्प्रेक्षा अलकार । सवैया मकराकृत कुंडल गूँज की माल के लाल लसै पग पॉवरिया । बछरानि चरावन के मिस भावतो दै गयौ भावती भाँवरिया ॥ रसखानि बिलोकत ही सिगरी भईँ बावरिया ब्रज-डॉवरिया । सजनी इहिँ गोकुल मैंँ विष सो बगरायौ हे नद के साँवरिया ॥ ६० ॥ शब्दार्थ—मकराकृत =मकरकी आकृति वाले । पॉवरिया=जूती । मिस= बहाने से । भावतो=प्रिय । भावती = सुहावनी । ब्रज—डॉकरिया=ब्रज- बलाएँ । बगरायौ है=बिखेर दिया है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानों से मकर की आकृति वाले कुं डल गले मे गुँजो की माला और पैरों मे जूतियाँ सुशोभित थी । वह प्रिय बछडो को चराने के बहाने से सुहावनी भाँवर दे गया । रसखान कहते हैं कि उसे देखते ही सारी ब्रज-वालाए पागल होगई । हे सजनी ! ऐसा प्रतीत होता है कि नद कुमार कृष्ण इस गोकुल मे विष बिखेर गया