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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२१२ रसखान-ग्रन्थावली गोपियाँ प्रत्येक समय नन्द के दरवाजे का चक्कर काटने लगीं। हे सखि ! इस ब्रज मे कोई भी ऐसी युवती नहीं है जिसे आनन्द-सागर कृष्ण ने अपने प्रेम के वश मे नहीं कर लिया है। विशेष — अन्तिम पंक्ति मे 'लटू नहीं' बौनी मुहावरे का भावमय प्रयोग है। तुलना — १. किती न गोकुल कुल-वधू, किहि न काहि मिस दीन । कौने तजी न कुल गली, है मुरली सुर-लीन ॥' —बिहारी २ 'सखि मोहि न मोहन को मुख देषि, सु ऐसी धौ गोकुल को कुल की ।' —ब्रह्म कवि सवैया बांकी धरै कलगी सिर ऊपर बांसुरी-तान कटै रस बीर के । कुण्डल कान लसै रसखानि बिलोकन तीर अनंग तुनीर के । डारि ठगोरी गयो चित चोरि लिए हैं सबै सुख सोखि सरीर के । जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला बे अहीर के ॥८८॥ शब्दार्थ — कलगी — मुकुट । अनंग = कामदेव । सोखि = सुखाना । अर्थ — कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वह अपने सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट धारण किये हुए है, बांसुरी मे वह आनन्द से भरी हुई तान बजाता है । उसके कानो मे कुण्डल शोभायमान है जिन्हे देखकर कामदेव के तूणीर के बाणो-जैसा प्रभाव पडता है, अर्थात् मन काम-वासना के वशीभूत हो जाता है । ऐसा कृष्ण मेरे ऊपर जादू डालकर मेरा मन चुरा कर ले गया है और उसने मेरे शरीर के सारे सुखो को नष्ट कर दिया है । फिर वह कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहती है कि हे अहीर के पुत्र ! इसमे तुम्हारी कौनसी वीरता है, जो तुम मुझ अबला पर काम-बाण चलाते हो । विशेष — १. 'बे' शब्द का प्रयोग अत्यधिक आत्मीयता का सूचक है । २. 'अबला' शब्द का सार्थक प्रयोग है, अतः परिकर अलंकार है ।