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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२२२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया छीर जौ चाहत चीर गहैं एजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ । चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ । जानति हौ जिय की रसखानि सु काहे कौ एतिक बात बढैहौ । गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्हजू नेकु न पैहौ ॥ १०४ ॥ शब्दार्थ—छीर = क्षीर, दूध । अचैहो = पीओगे । एतिक = उतनी । गोरस = दही । रस = आनन्द, इन्द्रिय, सुख । नेकुन = तनिक भी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से कह रही है कि हे कृष्ण ! तुम मेरा चीर पकड़ कर जो दूध माँग रहे हो, तो लो । देखती हूँ तुम कितना दूध पी जाओगे । चाखने के बहाने से जो मक्खन तुम माँग रहे हो तो लो और जितना चाहो उतना खालो । लेकिन मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूँ, इसलिए क्यो इतनी बढ़ा रहे हो । तुम दही के बहाने से जो इन्द्रिय-सुख चाहते हो, वह तुम्हे तनिक भी नही मिलेगा । तुलना—१. 'जो रस चाहो सो रस नाही गोरस पियहुँ अघाय ।' —सूरदास २. 'गोरस के मिस डोलती, सो रस नेकु न देइ ।' —रहीम ३. 'गोरस चाहत फिरत हौ, गोरस चाहत नाहिं ।' —बिहारी सवैया लगर छैलहि गोकुल मैं मग रोकत संग सखा ढिग तैं हैं । जाहि न ताहि दिखावत आँखि सु कौन गई अव तोसो करै हैं । हाँसी मे हार हट्यौ रसखानि जु जौ कहूँ नेकु तगा त्रुटि जै हैं । एकहि मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहि हाट बिकै हैं ॥ १०५ ॥ शब्दार्थ—लगर = प्रेमी । ढिग = पास । गई = परवाह, चिन्ता । अर्थ—गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि यह सच है कि तुम प्रेमी और छैला बनकर गोकुल में हमारा रास्ता रोक लेते हो, क्योकि तुम्हारे पास तुम्हारे बहुत से साथी हैं, लेकिन हमे अपनी चालें दिखाने की कोई जरूरत नही है, क्योकि अब तुम्हारी परवाह कोई नही करता । हे आनन्द-सागर कृष्ण