रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २२१ पाठान्तर— पहिले दधि लै गई गोकुल मे चख चार भए नटनागर पै । रसखान करी उन चातुरता कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख ते सिख लौ पट नील लपेटि लली सब भाँति कँपे डर पै । मनु दामिनी साँवन के घन मे निकसे नहि भीतर ही तरपै ॥ सवैया दानी नए भए माँगत दान सुने जु पे कंस तो बाँधे न जैहौ । रोकत हौ वन मे रसखानि पसारत हाथ महा दुख पैहौ । टूटे छरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै पुनि रेहौ । जै है जो भूषन काहू तिया को तौ मोल छलाके लला न बिकैहौ । १०३ ॥ शब्दार्थ—दानी = कर वसूल करने वाले । सुने जु पे कंस तौ बाँधे न जैहौ = यदि कंस सुन लेगा तो क्या बन्दी नही बना लिए जाओगे ? अर्थात् यह जानकर कि तुम उसकी प्रजा को तंग करते हो, कंस तुम्हे बन्दी बना लेगा । छरा = गूँजा की माला । छला = छल्ला, अँगूठी । अर्थ—दही के लिए जबरदस्ती करते हुए कृष्ण को भय दिखाती हुई कोई गोपी कहती है कि हे कृष्ण ! यह सुनकर कि तुम नये कर वसूल करने वाले अपने आप ही बन गए हो, कंस तुम्हे पकड़वा कर बन्दी बना लेगा । तुम बन मे हमारा मार्ग रोककर हमारे सामने दही के लिए हाथ फैलाते हो, इस प्रकार की याचक वृत्ति से तुम्हे बहुत अधिक दुख भोगना पड़ेगा । इस छीना-झपटी मे यदि किसी गोपी की गूँज की माला टूट गई तो उसकी क्षति-पूर्ति के लिए तुम्हारे पास जो बछड़ा आदि धन है, वह सबका सब देना पड़ जायेगा । और यदि संयोगवश किसी गोपी का कोई आभूषण टूट गया तो उसके एक छल्ले के मूल्य मे ही तुम्हे बिक जाना पड़ेगा । तुलना—'चेरी न तेरी न तेरे बबा की मै घेरी गली मे का पैर लड़ैहसौ । जो तुम चाहत चाखन माखन सो तुम माखन नेकु न पैहौ । कंस के राज मे घूम नही वरि आई बबा की सौ बूंद न देहौ । टूटैंगौ हार हजार को तौ तुम नन्द जसोदा समेत बिकैहो ॥ —अज्ञात