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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२२० रसखान-ग्रन्थावली सवैया आज महूँ दधि वेचन जात ही मोहन रोकि लियौ मग आयौ । माँगत दान मे आन लियौ सु कियौ निलजी रस जोवन खायौ ॥ काह कहूँ सिगरी री विथा रसखानि लियौ हसि के मुसकायौ । पाले परी मैं अकेली लली, लला लाज लियो सु कियो मनभायौ ॥१०१॥ शब्दार्थ—निलजी=लज्जा-रहित । सिगरी=सारी । विथा=व्यथा । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! आज जब मैं दही बेचने के लिए जा रही थी तो कृष्ण ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया । उसने दही का दान मागा, किन्तु उस दान के बदले मे उसने मुझे लज्जा-रहित करके यौवन रस का आनन्द लिया। हे सखि ! मैं अपनी समस्त व्यथा का क्या वर्णन करूँ, आनन्द सागर कृष्ण ने हँस-हँस कर मेरा यौवन दान लिया। मैं अकेली ही उसे मिल गई थी, अत मै कुछ कर भी नही सकती थी । उसने मेरी लज्जा ले ली और जो चाहा वही किया । विशेष—१ भावो की सम्मानित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । २. अंतिम पक्ति मे अनुप्रास अलंकार है । सवैया पहले दधि लै गई गोकुल मे चख चारि भए नटनागर पै । रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख तें सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपे डर पै । मनौ दामिनि सावन के घन मे निकसे नही भीतर ही तरपै ॥१०२॥ शब्दार्थ—चाव=आँख । मैनमई=प्रेम से परिपूर्ण । दामिनी=बिजली । अर्थ—दानलीला का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि पहले मै गोकुल मे दही ले गई । वहाँ मुझे कृष्ण मिल गये जिनसे आँखे चार हुईं । उन्होने मुझे प्रेम परिपूर्ण कर दिया और दही के दान के लिए अडकर खडे हो गये । मेरी सारी सखियाँ सिर से पैर तक अपने नीले वस्त्र को लपेटे हुए डर से काँप रही थी । वस्त्रो मे लिपटा हुआ उनका सौन्दर्य ऐसा प्रतीत होता था, मानो सावन मे उमडे हुए बादल मे से बिजली की द्युति न निकलने के कारण अन्दर ही अन्दर तडप रही हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार ।