भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236

व्याख्या भाग २१६ शब्दार्थ — अन्त मे = और किसी जगह से । गाँवरे को = गाँव का ही । लोचन = आँख । सौ — सौगन्ध । चीरि = फाडना । वगर = घर । अर्थ — कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कह रही है कि हे कृष्ण !' तुम और किसी जगह से नही आये हो । तुम्हारा जन्म हमारे इसी गाँव मे हुआ है । बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिला कर माँ बाप की तरह पाला है । उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो, तुम बचपन मे द्वार- द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखे नचा रहे हो । तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी उतारी तो । हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस के निकल जाने का और न अपने वस्त्रो के फट जाने का । हमे केवल यही दुख है कि तुम हमारे ही गाँव के और हमारे ही घर के होकर हमारा रास्ता रोक लेते हो और हमे तंग करते हो । पाठान्तर — इस कवित्त की तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'सो तो रसखान पहिचानं हू न मानत है' सवैया एक ते एक लौ कानन मै रहे ढीठ सखा सब लीने कन्हाई । आवत ही हौ कहाँ लौ कहौ कोउ कैसे सहै अति की अधिकाई ।। खायौ दही मेरो भाजन फोरयौ न छोड़त चीर दिवाएँ दुहाई । सौह जसोमति की रसखानि ते भागे मरू करि छूटन पाई ॥ १००॥ शब्दार्थ — एक तें एक लौ = एक से एक बढकर । ढीठ = शरारती । सौह = सौगन्ध । मरु करि = कठिनता से । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की दधिलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण एक से एक बढ कर शरारती साथियो को लेकर बन मे रहता है । उनकी शरारत की बाते कहाँ तक कहूँ, और कोई किस प्रकार उनकी शरारत की अति को सहन कर सकती है कि किसी भी गोपी के आते ही वे उसे तंग करने लगते है । उन्होने मेरी दही खा ली, मेरा मटका फोड दिया और अनेक प्रकार की दुहाई देने पर भी मेरे वस्त्रो को पकडे रहा । रसखान कहते है कि जब मैने उसे यशोदा जी की सौगन्ध खिलाई तो वे भागे और मै बडी कठिनता से उनसे छूट पाई ।