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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२१८ रसखान-ग्रन्थावली अचानक मिलना। बूडि = डूबना। डोरि लियो = बाँध लिया। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से मिल कर गई है। उसी का वर्णन करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! मैं आज प्रातः जब कुंज गली से निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुसकान में मेरा मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुसकान की छवि पर से हटाने पर भी नही हटा। उस मुसकान ने मेरे नयनो को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फन्दा डाल दिया। तुम्ही बताओ, अब मैं क्या करूँ। मेरे चित्त में बसा हुआ कृष्ण कैसे बाहर निकल सकता है ? उस आनन्द सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने मेरे सारे शरीर को घेर लिया है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण के साथ हुआ मिलन और तज्जन्य सुख भुलाने से भी नही भुलाया जा रहा है। सोरठा देख्यौ रूप अपार, मोहन सुन्दर स्याम को। वह ब्रजराज कुमार, हिय जिय नैननि में बस्यौ ॥ ६८ ॥ शब्दार्थ—मोहन = मोहने वाला। हिय-हृदय। जिय = मन। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि मैंने मोहने वाले सुन्दर कृष्ण का जब से अपार रूप देखा है, तबसे वह ब्रजराज कुमार मेरे हृदय में, मन में और आँखो मे बसा हुआ है। नटखट कृष्ण कवित्त अन्त ते न आयो याही गाँवरे को जायौ, माई बाप रे जिवायौ प्याइ दूध वारे वारे को। सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै, लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को। मैया की सौं सोच कछू मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को। यहै दुख भारी गहै उमर हमारी माँझ, नगर हमारे ग्वाल वगर हमारे को ॥ ६६ ॥