रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २१७ सुधि-बुधि भूल कर पृथ्वी पर गिर पडी । घर की मर्यादा के सारे बंधन टूट गये और आर्य धर्म की लज्जा का बडप्पन भी छूट गया; अर्थात् मैं अपने न्वंश की मर्यादा और नारी-सुलभ लज्जा को त्याग कर कृष्ण की ओर देखती रही। सवैया खंजन नैन फँदे पिंजरा छबि नाहि रहै थिर कैसे हूँ भाई। छूटि गई कुलकानि सखी रसखानि लखी मुसकानि सुहाई ॥ चित्र कढे से रहे मेरे नैन न बैन कढ़े मुख दीनी दुहाई। कैंसी करौ कित जाऊँ अली सब बोलि उठैं यह बावरी आई ॥ ६६ ॥ शब्दार्थ — खंजन नैन = खंजन रूपी नेत्र । थिर — स्थिर । कुलकानि = कुल की मर्यादा। कढे से = अंकित से। अर्थ — कोई गोपी अपनी प्रेमावस्था का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि मेरे खन्जन रूपी नेत्र कृष्ण के शोभा रूपी पिंजडे मे बन्दी हो गये हैं। हे सखि ! ये किसी भी प्रकार स्थिर नही रहते। बार-वार बरबस कृष्ण की छवि को देखने की लालसा मे उसी की ओर दौडते रहते है। हे सखि ! जब से मैने आनन्द सागर कृष्ण की मनोहर मुस्कराहट देखी है, तबसे मैने अपने कुल की मर्यादा को भी छोड दिया है। मेरे ये नेत्र, सदैव अपलक रहने के कारण, चित्र मे अंकित से बने रहते है। प्रयत्न करने पर भी मुख कोई शब्द नही निकलता। हे सखि ! तुम्ही बताओ कि मैं क्या करूँ, किधर जाऊँ, क्योकि मै जिधर जाती हूँ उसी ओर लोग कहते है कि वह पगली आ गई है। विशेष — प्रेमावस्था का सजीव एवं मार्मिक चित्रण है। कुंज लीला सवैया कु जगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ भटभेरो । माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूढि फिरै नहि फेरो ॥ डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डारयौ है प्रेम को फंद घनेरो । कैंसी करौ अब क्यो निकसो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ॥ ६७ ॥ शब्दार्थ — अली = सखी । ढोटा = कृष्ण से तात्पर्य है। भटभेरो = मुठभेड़