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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

व्याख्या भाग २१७ सुधि-बुधि भूल कर पृथ्वी पर गिर पडी । घर की मर्यादा के सारे बंधन टूट गये और आर्य धर्म की लज्जा का बडप्पन भी छूट गया; अर्थात् मैं अपने न्वंश की मर्यादा और नारी-सुलभ लज्जा को त्याग कर कृष्ण की ओर देखती रही। सवैया खंजन नैन फँदे पिंजरा छबि नाहि रहै थिर कैसे हूँ भाई। छूटि गई कुलकानि सखी रसखानि लखी मुसकानि सुहाई ॥ चित्र कढे से रहे मेरे नैन न बैन कढ़े मुख दीनी दुहाई। कैंसी करौ कित जाऊँ अली सब बोलि उठैं यह बावरी आई ॥ ६६ ॥ शब्दार्थ — खंजन नैन = खंजन रूपी नेत्र । थिर — स्थिर । कुलकानि = कुल की मर्यादा। कढे से = अंकित से। अर्थ — कोई गोपी अपनी प्रेमावस्था का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि मेरे खन्जन रूपी नेत्र कृष्ण के शोभा रूपी पिंजडे मे बन्दी हो गये हैं। हे सखि ! ये किसी भी प्रकार स्थिर नही रहते। बार-वार बरबस कृष्ण की छवि को देखने की लालसा मे उसी की ओर दौडते रहते है। हे सखि ! जब से मैने आनन्द सागर कृष्ण की मनोहर मुस्कराहट देखी है, तबसे मैने अपने कुल की मर्यादा को भी छोड दिया है। मेरे ये नेत्र, सदैव अपलक रहने के कारण, चित्र मे अंकित से बने रहते है। प्रयत्न करने पर भी मुख कोई शब्द नही निकलता। हे सखि ! तुम्ही बताओ कि मैं क्या करूँ, किधर जाऊँ, क्योकि मै जिधर जाती हूँ उसी ओर लोग कहते है कि वह पगली आ गई है। विशेष — प्रेमावस्था का सजीव एवं मार्मिक चित्रण है। कुंज लीला सवैया कु जगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ भटभेरो । माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूढि फिरै नहि फेरो ॥ डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डारयौ है प्रेम को फंद घनेरो । कैंसी करौ अब क्यो निकसो रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ॥ ६७ ॥ शब्दार्थ — अली = सखी । ढोटा = कृष्ण से तात्पर्य है। भटभेरो = मुठभेड़

२१८ रसखान-ग्रन्थावली अचानक मिलना। बूडि = डूबना। डोरि लियो = बाँध लिया। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से मिल कर गई है। उसी का वर्णन करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! मैं आज प्रातः जब कुंज गली से निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुसकान में मेरा मन इतना अधिक डूब गया कि वह उस मुसकान की छवि पर से हटाने पर भी नही हटा। उस मुसकान ने मेरे नयनो को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फन्दा डाल दिया। तुम्ही बताओ, अब मैं क्या करूँ। मेरे चित्त में बसा हुआ कृष्ण कैसे बाहर निकल सकता है ? उस आनन्द सागर कृष्ण के सौन्दर्य ने मेरे सारे शरीर को घेर लिया है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण के साथ हुआ मिलन और तज्जन्य सुख भुलाने से भी नही भुलाया जा रहा है। सोरठा देख्यौ रूप अपार, मोहन सुन्दर स्याम को। वह ब्रजराज कुमार, हिय जिय नैननि में बस्यौ ॥ ६८ ॥ शब्दार्थ—मोहन = मोहने वाला। हिय-हृदय। जिय = मन। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई कहती है कि मैंने मोहने वाले सुन्दर कृष्ण का जब से अपार रूप देखा है, तबसे वह ब्रजराज कुमार मेरे हृदय में, मन में और आँखो मे बसा हुआ है। नटखट कृष्ण कवित्त अन्त ते न आयो याही गाँवरे को जायौ, माई बाप रे जिवायौ प्याइ दूध वारे वारे को। सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै, लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को। मैया की सौं सोच कछू मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को। यहै दुख भारी गहै उमर हमारी माँझ, नगर हमारे ग्वाल वगर हमारे को ॥ ६६ ॥

व्याख्या भाग २१६ शब्दार्थ — अन्त मे = और किसी जगह से । गाँवरे को = गाँव का ही । लोचन = आँख । सौ — सौगन्ध । चीरि = फाडना । वगर = घर । अर्थ — कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कह रही है कि हे कृष्ण !' तुम और किसी जगह से नही आये हो । तुम्हारा जन्म हमारे इसी गाँव मे हुआ है । बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिला कर माँ बाप की तरह पाला है । उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो, तुम बचपन मे द्वार- द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखे नचा रहे हो । तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी उतारी तो । हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस के निकल जाने का और न अपने वस्त्रो के फट जाने का । हमे केवल यही दुख है कि तुम हमारे ही गाँव के और हमारे ही घर के होकर हमारा रास्ता रोक लेते हो और हमे तंग करते हो । पाठान्तर — इस कवित्त की तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'सो तो रसखान पहिचानं हू न मानत है' सवैया एक ते एक लौ कानन मै रहे ढीठ सखा सब लीने कन्हाई । आवत ही हौ कहाँ लौ कहौ कोउ कैसे सहै अति की अधिकाई ।। खायौ दही मेरो भाजन फोरयौ न छोड़त चीर दिवाएँ दुहाई । सौह जसोमति की रसखानि ते भागे मरू करि छूटन पाई ॥ १००॥ शब्दार्थ — एक तें एक लौ = एक से एक बढकर । ढीठ = शरारती । सौह = सौगन्ध । मरु करि = कठिनता से । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की दधिलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण एक से एक बढ कर शरारती साथियो को लेकर बन मे रहता है । उनकी शरारत की बाते कहाँ तक कहूँ, और कोई किस प्रकार उनकी शरारत की अति को सहन कर सकती है कि किसी भी गोपी के आते ही वे उसे तंग करने लगते है । उन्होने मेरी दही खा ली, मेरा मटका फोड दिया और अनेक प्रकार की दुहाई देने पर भी मेरे वस्त्रो को पकडे रहा । रसखान कहते है कि जब मैने उसे यशोदा जी की सौगन्ध खिलाई तो वे भागे और मै बडी कठिनता से उनसे छूट पाई ।

२२० रसखान-ग्रन्थावली सवैया आज महूँ दधि वेचन जात ही मोहन रोकि लियौ मग आयौ । माँगत दान मे आन लियौ सु कियौ निलजी रस जोवन खायौ ॥ काह कहूँ सिगरी री विथा रसखानि लियौ हसि के मुसकायौ । पाले परी मैं अकेली लली, लला लाज लियो सु कियो मनभायौ ॥१०१॥ शब्दार्थ—निलजी=लज्जा-रहित । सिगरी=सारी । विथा=व्यथा । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! आज जब मैं दही बेचने के लिए जा रही थी तो कृष्ण ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया । उसने दही का दान मागा, किन्तु उस दान के बदले मे उसने मुझे लज्जा-रहित करके यौवन रस का आनन्द लिया। हे सखि ! मैं अपनी समस्त व्यथा का क्या वर्णन करूँ, आनन्द सागर कृष्ण ने हँस-हँस कर मेरा यौवन दान लिया। मैं अकेली ही उसे मिल गई थी, अत मै कुछ कर भी नही सकती थी । उसने मेरी लज्जा ले ली और जो चाहा वही किया । विशेष—१ भावो की सम्मानित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । २. अंतिम पक्ति मे अनुप्रास अलंकार है । सवैया पहले दधि लै गई गोकुल मे चख चारि भए नटनागर पै । रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख तें सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपे डर पै । मनौ दामिनि सावन के घन मे निकसे नही भीतर ही तरपै ॥१०२॥ शब्दार्थ—चाव=आँख । मैनमई=प्रेम से परिपूर्ण । दामिनी=बिजली । अर्थ—दानलीला का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि पहले मै गोकुल मे दही ले गई । वहाँ मुझे कृष्ण मिल गये जिनसे आँखे चार हुईं । उन्होने मुझे प्रेम परिपूर्ण कर दिया और दही के दान के लिए अडकर खडे हो गये । मेरी सारी सखियाँ सिर से पैर तक अपने नीले वस्त्र को लपेटे हुए डर से काँप रही थी । वस्त्रो मे लिपटा हुआ उनका सौन्दर्य ऐसा प्रतीत होता था, मानो सावन मे उमडे हुए बादल मे से बिजली की द्युति न निकलने के कारण अन्दर ही अन्दर तडप रही हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार ।

व्याख्या भाग २२१ पाठान्तर— पहिले दधि लै गई गोकुल मे चख चार भए नटनागर पै । रसखान करी उन चातुरता कहै दान दे दान खरे अर पै ॥ नख ते सिख लौ पट नील लपेटि लली सब भाँति कँपे डर पै । मनु दामिनी साँवन के घन मे निकसे नहि भीतर ही तरपै ॥ सवैया दानी नए भए माँगत दान सुने जु पे कंस तो बाँधे न जैहौ । रोकत हौ वन मे रसखानि पसारत हाथ महा दुख पैहौ । टूटे छरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै पुनि रेहौ । जै है जो भूषन काहू तिया को तौ मोल छलाके लला न बिकैहौ । १०३ ॥ शब्दार्थ—दानी = कर वसूल करने वाले । सुने जु पे कंस तौ बाँधे न जैहौ = यदि कंस सुन लेगा तो क्या बन्दी नही बना लिए जाओगे ? अर्थात् यह जानकर कि तुम उसकी प्रजा को तंग करते हो, कंस तुम्हे बन्दी बना लेगा । छरा = गूँजा की माला । छला = छल्ला, अँगूठी । अर्थ—दही के लिए जबरदस्ती करते हुए कृष्ण को भय दिखाती हुई कोई गोपी कहती है कि हे कृष्ण ! यह सुनकर कि तुम नये कर वसूल करने वाले अपने आप ही बन गए हो, कंस तुम्हे पकड़वा कर बन्दी बना लेगा । तुम बन मे हमारा मार्ग रोककर हमारे सामने दही के लिए हाथ फैलाते हो, इस प्रकार की याचक वृत्ति से तुम्हे बहुत अधिक दुख भोगना पड़ेगा । इस छीना-झपटी मे यदि किसी गोपी की गूँज की माला टूट गई तो उसकी क्षति-पूर्ति के लिए तुम्हारे पास जो बछड़ा आदि धन है, वह सबका सब देना पड़ जायेगा । और यदि संयोगवश किसी गोपी का कोई आभूषण टूट गया तो उसके एक छल्ले के मूल्य मे ही तुम्हे बिक जाना पड़ेगा । तुलना—'चेरी न तेरी न तेरे बबा की मै घेरी गली मे का पैर लड़ैहसौ । जो तुम चाहत चाखन माखन सो तुम माखन नेकु न पैहौ । कंस के राज मे घूम नही वरि आई बबा की सौ बूंद न देहौ । टूटैंगौ हार हजार को तौ तुम नन्द जसोदा समेत बिकैहो ॥ —अज्ञात

२२२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया छीर जौ चाहत चीर गहैं एजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ । चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ । जानति हौ जिय की रसखानि सु काहे कौ एतिक बात बढैहौ । गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्हजू नेकु न पैहौ ॥ १०४ ॥ शब्दार्थ—छीर = क्षीर, दूध । अचैहो = पीओगे । एतिक = उतनी । गोरस = दही । रस = आनन्द, इन्द्रिय, सुख । नेकुन = तनिक भी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से कह रही है कि हे कृष्ण ! तुम मेरा चीर पकड़ कर जो दूध माँग रहे हो, तो लो । देखती हूँ तुम कितना दूध पी जाओगे । चाखने के बहाने से जो मक्खन तुम माँग रहे हो तो लो और जितना चाहो उतना खालो । लेकिन मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूँ, इसलिए क्यो इतनी बढ़ा रहे हो । तुम दही के बहाने से जो इन्द्रिय-सुख चाहते हो, वह तुम्हे तनिक भी नही मिलेगा । तुलना—१. 'जो रस चाहो सो रस नाही गोरस पियहुँ अघाय ।' —सूरदास २. 'गोरस के मिस डोलती, सो रस नेकु न देइ ।' —रहीम ३. 'गोरस चाहत फिरत हौ, गोरस चाहत नाहिं ।' —बिहारी सवैया लगर छैलहि गोकुल मैं मग रोकत संग सखा ढिग तैं हैं । जाहि न ताहि दिखावत आँखि सु कौन गई अव तोसो करै हैं । हाँसी मे हार हट्यौ रसखानि जु जौ कहूँ नेकु तगा त्रुटि जै हैं । एकहि मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहि हाट बिकै हैं ॥ १०५ ॥ शब्दार्थ—लगर = प्रेमी । ढिग = पास । गई = परवाह, चिन्ता । अर्थ—गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि यह सच है कि तुम प्रेमी और छैला बनकर गोकुल में हमारा रास्ता रोक लेते हो, क्योकि तुम्हारे पास तुम्हारे बहुत से साथी हैं, लेकिन हमे अपनी चालें दिखाने की कोई जरूरत नही है, क्योकि अब तुम्हारी परवाह कोई नही करता । हे आनन्द-सागर कृष्ण

व्याख्या भाग २२३ तुमने हँसी-हँसी मे मेरा हार ले लिया है, लेकिन ध्यान रखो, यदि इसका जर सा भी धागा टूट गया तो सिर्फ इसके एक मोती के लिए तुम सारे व्रज के बाजार मे बिकते फिरोगे । सवैया काहू को माखन चाखि गयौ अरु काहू को दूध दही ढरकायौ । काहू को चीर लै रूख चढ़यौ अरु काहूको गुजघरा छहरायौ । मानै नही बरजे रसखानि सु जानियै राज इन्हें घर आयौ । आव री बूझैँ जसोमति सो यह छोहरा जायौ कि मेव मगायौ ॥ १०६॥ शब्दार्थ—ढरकायौ=बिखेर दिया । गुजछरा=गुंजो की माला । छह- रायौ=तोड़ दी । बरजे=रोकने पर मेव=लूट मार करने वाला । अर्थ—कृष्ण की शरारतो से तग आकर गोपियाँ परस्पर उपालम्भ देती हुई कहती है कि यह कृष्ण हमे बहुत तग कर रहा है। किसी का मक्खन छीनकर उसे खा लिया, किसी की दही बिखेर दी और दूध बिखेर दिया । किसी का वस्त्र लेकर पेड पर चढ गया । किसी की गुजो की माला तोड दी । रसखान कहते है कि रोकने पर भी यह अपनी आदतो से वाज नही आता । ऐसा जान पडता है कि इन्ही के घर का राज्य आ गया हो । हे सखियो ! आयो, और यशोदा जी से यह चलकर मालूम करे कि तुमने यह पुत्र उत्पन्न किया है या लूटमार करने वाला मेव । विशेष—कृष्ण जी विविध लीलाओ का भावपूर्ण वर्णन है । मुरली प्रभाव कवित्त दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ तातो, न जमायौ कर्यौ, जामन दयौ सो धर्यौ धर्यौई खटाइगौ । आन हाथ आन पाइ सबही के तब ही ते, जब ही ते रसखानि ताननि सुनाइगौ । ज्योही नर त्यौहो नारी तैसीयै तरुन वारी, कहिये कहा री सब ब्रिज विललाइ गौ । ज्योही नर त्योही नारी तैसीयै तरुन वारी, कहिये कहा री सब ब्रज बिललाइ गौ । जानियै न माली यह छोहरा जसोमति को, बाँसुरी बजाइ गौ कि विष बगराइ गौ ॥१०६॥ शब्दार्थ—तातो=गर्म । जामन=दूध को जमाने के लिए दही का जो

२२४ रसखान-ग्रन्थावली

हिस्सा दूध मे डाला जाता है, उसे जामन कहते हैं । पाइ = पाँव, चरण । रसखानि आनन्द-सागर कृष्ण । वारी = युवती ।छोहरा = पुत्र । बगराइ = बिखेरना । अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन कोई गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब कृष्ण ने बाँसुरी बजाई तो ब्रज की सारी व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो गई । जो निकाला हुआ दूध गर्म था, वह ठंडा पड़ गया, इसीलिए वह जमाया न जा सका, क्योकि बाँसुरी की धुनि को सुनकर दूध जमाने वाली गोपी दूध जमाना ही भूल गई । जिस गोपी ने दूध को जमाने के लिए उसमे जामन लगा दिया था, वह उसे उचित स्थान पैर रखना भूल गई, अत वह रक्खा-रक्खा ही खट्टा हो गया । जब से आनन्द- सागर कृष्ण ने बाँसुरी की मधुर ताने सुनाई है, तब से ब्रजवासियो के हाथ पेर और ही हो गये हैं, अर्थात् उनके हाथ-पैर चलते ही नही । जो दशा आदमियों की है, वही दशा स्त्रियो की है, वही युवको और युवतियो की है। हे सखि ! मैं ब्रज की दुर्दशा का कहाँ तक वर्णन करूँ, बस इतना समझ लो कि सारा ब्रज ही व्याकुल हो गया । हे सखि ! पता नही, यशोदा-पुत्र ने बांसुरी बजाई थी या ब्रज मे विष बिखेरा था, जिसके कारण सारे ब्रज-बासियो की कर्मण्य- शक्ति ही नष्ट हो गई । विशेष—सदेह अलंकार । तुलना—'आन कहै आन करै आन हाथ पाइ भई, अनंग के अनख दही न सुधि तिय मे । सीरो तान तातौ कर तातो जान सीरो करै, दूध न जमायो जाइ नेह जम्यो हिय मे ।' —केशव. कवित्त जल की न घट भरै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भर साँसु री । एकै सुनि लोट गई एकै लोट-पोट भई , एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री । कहै रसखानि सो सबै ब्रज-बनिता वधि, बधिक कहाय हाय भई कुल हाँसु री ।

व्याख्या भाग २२५ करियै उपायै बास डारियै कटाय, नाहिं उपजैगौ बाँस नाहिं बाजे फेरि बाँसुरी ॥१०८॥ शब्दार्थ—घट=घड़ा। वधि=वध करके, मार करके। अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के अपूर्व प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने जब बाँसुरी बजाई तो सारे ब्रज के काम बन्द हो गए। जो गोपियाँ यमुना नदी मे घुस कर पानी भरने वाली थी वे पानी मे खड़ी की खड़ी रह गईं और अपना घड़ा न भर सकी। जो मार्ग मे आ रही थी, वे वही रुक गईं, एक कदम भी आगे न रख सकी। जो घर मे थी, वे अपना सारा कार्य छोड़कर केवल लम्बे-लम्बे साँस भरने लगी। एक गोपी बांसुरी की धुनि को सुनकर तथा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गई, एक लोट-पोट हो गई, एक की आँखो से आँसू निकल आये। रसखान कहते है कि वह गोपी अपनी सखी से कहती ही गई कि कृष्ण तो सारी ब्रज-नारियो का वध करके बधिक बन गये और हम उसके प्रेम मे पड़- कर अपने कुल की हँसी का कारण बन गई। अब तो यही उपाय करना चाहिए कि दुनिया के सारे बाँसो को कटवा डालो। इससे न तो बाँस रहेगा और न फिर बाँसुरी बनकर हमे व्यथित करेगी। विशेष—१. कृष्ण की बाँसुरी.का प्रभाव-वर्णन अत्यन्त भावपूर्ण है। २. अतिम पक्ति मे लोकोक्ति का सुन्दर प्रयोग है। ३. डा० भवानीशंकर आशिक इस कवित्त को रसखानकृत नही मानते। अतः हमने इसे संदिग्ध छन्दो के अन्तर्गत भी रखा है। सवैया चद सो आनन मैन-मनोहर बैन मनोहर मोहत हौ मन। बक बिलोकनि लोट भई रसखानि हियो हित दाहत हौ तन॥ मैं तब तै कुलकानि की मैड़ नखी जु सखी अब डोलत हो बन। वेनु बजावत आवत है नित मेरी गली ब्रजराज को मौहन ॥ शब्दार्थ-आनन = मुख। मैन = कामदेव। हित = प्रेम। कुल-कानि की मैंड = कुल की मर्यादा की सीमा। अर्थ—बाँसुरी के प्रभाव से कृष्ण के प्रति उत्पन्न प्रेम की बात एक गोपी अपनी सखी को बताती हुई कह रही है कि हे सखि ! चन्द्रमा के समान सुन्दर

२२६ रसखान-ग्रन्थावली मुख वाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर मैं सज्ञा शून्य हो गई। आनन्द- सागर कृष्ण का मेरे हृदय मे बसा हुआ प्रेम मेरे शरीर को जलाता है। मैंने तभी से कुल की मर्यादा की सीमा छोड दी है और अब कृष्ण को प्राप्त करने के लिए वन-वन डोल रही हूँ, क्योकि व्रज के मन को मोहने वाला ब्रजराज कृष्ण बाँसुरी बजाता हुआ प्रतिदिन मेरी गली आता है। विशेष—'चद सो आनन' मे उपमा और 'मैन मनोहर' मे रूपक अलकार है। सवैया बाँकी विलोकनि रंगभरी रसखानि खरी मुसकानि सुहाई । बोलत बोल अमीनिधि चैन महारस-ऐन सुनै सुखदाई ॥ सजनी पुर-बीथिन मै पिय-गोहन लागी फिरै जित ही तित धाई । बाँसुरी टेरि सुनाइ अली अपनाइ लई ब्रजराज कन्हाई ॥११०॥ शब्दार्थ—विलोकनि = दृष्टि । रगभरी = प्रेमपूर्ण । रसखानि = आनन्द- सागर कृष्ण की । खरी = सुन्दर । बोल = वचन । अमीनिधि = अमृत का भंडार । चैन = आनन्द । महारस-ऐन = अत्यन्त आनन्द का भंडार । पुर-वीथिन मैं = नगर की गलियो मे । पिय-गोहन = कृष्ण के साथ । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उस कृष्ण की दृष्टि प्रेमपूर्ण है, वह आनद का सागर है, उसकी सुन्दर मुस्कान मन को मोहने वाली है। वह अमृत-भडार से युक्त वचनो को कहता है ; अर्थात् उसकी वाणी का माधुर्य अमृत के समान परमानन्द प्रदान करने वाला है। उसकी मधुर वाणी अत्यन्त आनन्द का भंडार है, जिसे सुनने से सुख प्राप्त होता है। हे सजनी ! नगर की गलियो मे समस्त ब्रज बालाएँ कृष्ण के साथ-साथ लगी हुई है। वह जिधर भी जाता है, सभी गोपियाँ उधर ही दौडने लगती है। हे सखी ! उस ब्रजराज कृष्ण ने बांसुरी की ध्वनि सुनाकर समस्त व्रज-बालाओ को अपने प्रेम के वशीभूत कर लिया है। विशेष—अनुप्रास, यमक अलकार ।

व्याख्या भाग २२७ सवैया डोरि लियौ मन मोरि लियो चित जोहि लियौ हित तोरि कै कानन । कुंजनि ते निकस्यौ सजनी मुसकाइ कह्यौ वह सुन्दर आनन ॥ हो रसखानि भई रसमत्त सखी सुनि के कल बाँसुरी कानन । मत्त भई बन वीथिन डोलति मानति काहू की नेकु न आनन ॥ १११ ॥ शब्दार्थ—डोरि लियौ=बाँध लिया। हित=प्रेम । कान=मर्यादा । आनन=मुख । कानन=बन । आनन=बाधाएँ । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने मेरे मन को बाँध लिया है, चित्त को चुरा लिया है, मर्यादा तोडकर मुझसे प्रेम जोड लिया है। हे सजनी ! वह अपने सुन्दर मुख पर मुस्कराहट लिए कुंजो मे से निकला । रसखान कहते है कि हे सखि बन मे उसकी मधुर बाँसुरी को सुनकर मैं रसमत्त हो गई । तभी से मै उन्मत्त होकर वन-वन और गली-गली घूमती फिर रही हूँ और किसी भी प्रकार की बाधाओ को नही मानती ! अर्थात् अब मुझे किसी भी प्रकार की बाधा का डर नही रहा है । सवैया मेरो सुभाव चितैवे को माइ री लाल निहारि कै बसी बजाई । वा दिन ते मोहि लागी ठगौरी सी लोग कहै कोई बावरी आई ॥ यौ रसखानि घिरयो सिगरो ब्रज जानत वे कि मेरो जियराई । जौ कोउ चाहै भलौ अपनो तौ सनेह न काहू सो कीजियौ माई ॥ ११२ ॥ शब्दार्थ—चित्तैवे को=देखने के लिए । निहारि के=देखकर । ठगौरी =जादू । जियराई=हृदय । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मेरा स्वभाव देखने के लिए, मुझे देखकर,कृष्ण ने अपनी वंशी बजाई । उसी दिन से मुझ पर जादू-सा चल गया है । लोग मुझे देखकर कहते है कि कोई पगली आ गई है, अर्थात् लोग मुझे पगली समझते है । रसखान कहते हैं कि इस प्रकार सारे ब्रज के निवासी मुझे घेर लेते है । मेरे मन की या तो कृष्ण जानते है या मैं स्वय जानती हूँ । यदि इस जगत् मे कोई अपना भला चाहता है तो उसे कभी - भी किसी से प्रेम नही करना चाहिए ।

२२८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया मोहन की मुरली सुनिकै वह वौरि ह्वै आनि अटा चढि झांकी। गोप बडेन की डीठि बचाइ कै डीठि सो डीठि मिली दुहुँ झांकी॥ देखत मोल भयौ अँखियान को को करै लाज कुटुम्ब पिता की। कैसे छुटाई छुटै अटकी रसखानि दुहुँ की विलोकनि वांकी ॥११३॥ शब्दार्थ—बौरी ह्वै = पागल होकर। विलोकनि वांकी = वक्र चितवन। अर्थ—गोपी प्रेम का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कह रह है कि कृष्ण की मुरली की तान को सुन कर वह पागल होकर अटारी पर चढ़ कर नीचे की ओर झाँकी। अन्य लोगो की निगाह बचाकर उसने कृष्ण से निगाह मिलाई। दोनो की आँखे मिली। आँखे मिलते ही दोनो मे प्रेम हो गया और उन्होने कुल की तथा पिता की लाज को तिलाजलि दे दी। रसखान कवि कहते है कि उन दोनो की परस्पर मिली हुई बाँकी चितवन किस प्रकार हटाने से हट सकती है अर्थात् उन दोनो का प्रेम नही टूट सकता। सवैया बसी बजावत आनि कढो सो गली मैं अली ! कछु टोना सो डारे। हेरि चिते, तिरछी करि दृष्टि चलौ गयो मोहन मूठि सी मारे॥ ताही घरी सो परी घरी सेज पै प्यारी न बोलति प्रानहुँ वारे। राधिका जी है तो जी है सबै न तो पीहै हलाहल नन्द के द्वारे ॥११४॥ शब्दार्थ—टोना = जादू। हेरि = देखकर। मूठि सी मारे = मूठ सी मार- कर। हलाहल = विष। अर्थ—प्रेम व्यथिता राधिका जी का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! बाँसुरी को बजाता हुआ वह कृष्ण अचानक गली मे आ निकला और राधा पर कुछ जादू सा डाल गया। वह उसकी ओर देखकर ध्यान देकर और तिरछी निगाह करके मन को मोहने वाली मूठ सी मार कर चला गया; अर्थात् राधा पर अपना प्रेम जगा कर और राधा के हृदय मे प्रेम की भावना जगाकर चला गया। वह प्यारी राधा उसी समय से सेज पर निश्चेष्ट होकर पडी हुई है। वह कुछ बोलती भी नही है तथा अपने प्राणो को न्योछावर करने पर उतारू है। हे सखि ! यदि राधा जी जीवित बच गई तो हम सबका जीवन है, यदि वह मर गई तो हम सभी नन्द के द्वारे

व्याख्या भाग २२६ पर जाकर विष पी लेगी; अर्थात् उसके द्वारे पर जाकर आत्म-हत्या कर लेगी। विशेष—१. जी है तो जी हैं, मे यमक अलकार है। २ 'न तो पी है हलाहल नन्द के द्वारे' में मन का सारल्य एवं दृढता निहित है। झुलना—'चेतै न जो वृषभान सुता दुख ह्वै ह्वै बडो इहि की सजनीन को। जाय के खाय परेगी सबै या अहीर के द्वार पे हीर-कनीन को ॥ —अज्ञात सवैया कल- काननि कुण्डल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजति है। मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महा छबि छाजति है ॥ रसखानि लखे तन पीत पटा सत दामिनि सी दुति लाजति है। वहि बासुरी की धुनि कान परे कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥११५॥ शब्दार्थ—कल = सुन्दर । काननि = कानो मे । अधरा = होठो पर । मुसकानि-तरग = हसी की लहरे। छाजति है = शोभायमान है। सत दामिनि की = सैकड़ो बिजलियो की। दुति = द्युति, शोभा। लाजति है = लज्जित होता है। कुलकानि = वश की मर्यादा। भाजति है = भागती है। अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा तथा उनकी बांसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानो मे सुन्दर कुण्डल, सिर पर मोर-पखो का मुकट और हृदय पर वैजयन्तीमाला सुशोभित है। उनके हाथ मे वशी और होठो पर मुसकराहट की लहरें अत्यन्त शोभा प्राप्त करती है। रसखान कवि कहते है कि उनके तन पर सुशोभित पीले वस्त्र को देखकर सैकडो बिजलियो की शोभा लज्जित होती है। उसी बाँसुरी की ध्वनि कानो मे पडने पर व्रज-बनिताएँ अपने हृदय से वंश की मर्यादा छोड़ कर उसी ओर भागती है। विशेष—अनुप्रास, रूपक और प्रतीप अलकार । सवैया काल्हि भटू मुरली-धुनि मे रसखानि लियौ कहूँ नाम हमारौ। ता छिन ते भई बैरिनि सास कितौ कियौ झाँकन देति न द्वारौ ॥

२३० रसखान-ग्रन्थावली होत चवाव बलाई सो आली री जो भरि आँखिन भेंटिये प्यारो । वाट परी अव री ठठक्यौ हियरे अटक्यौ पियरे पटवारौ ॥ ११६ ॥ शब्दार्थ—पटू = सखी । चवाव = बदनामी की चर्चा । जो भरि आँखिन = आँखें खोलकर । वाट परी = रास्ता रुक गया । ठिठक्यौ = रुक गया । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने अपनी मुरली मे मेरा नाम बजा दिया था । तभी से मेरी सासू मेरी वैरिण हो गई है, तथा प्रयत्न करने पर भी द्वार झाँकने नही देती, अर्थात् मैं अपने घर से बाहर निकलने का बहुत प्रयत्न करती हूँ, किन्तु मेरी सासू मुझे तनिक भी बाहर नही आने देती है । हे सखि ! यदि मैं कृष्ण को तनिक भी आँखे भर कर देख लेती हूँ तो इससे मेरी भारी बदनामी होती है । जब से कृष्ण मेरे मन मे बसा है, अर्थात् कृष्ण से मुझे प्रेम हुआ है, तब से मेरा रास्ता और हृदय दोनो रुक गये है, अर्थात् न तो मैं कहीं बाहर जा सकती हूँ और न अपने हृदय से कृष्ण को ही निकाल सकती हूँ । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार है । पाठान्तर--इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'एक समै मुरली धुनि मे रसखान लियो उन नाम हमारो ।' सवैया आजु भटू इक गोपवधू भई बावरी नेकु न अग सम्हारै । माई सु धाइ कै टौना सो ढूँढति सास सयानी-सयानी पुकारै ॥ यौ रसखानि घिरौ सिगरौ ब्रज आन को आन उपाय विचारै । कोऊ न कान्हर के कर ते वहि वैरिणि वासरिया गहि जारै ॥११७॥ शब्दार्थ—भटू = सखी । टोना = जादू । सयानी = टोना करने वाली । आन को आन = अन्य-अन्य प्रकार के । कान्हर के = कृष्ण के । गहि जारै = लेकर जलाता है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण की बासुरी की ध्वनि सुन कर एक गोप वधू पागल हो गई, उसे अपने अगो की सम्हालने का तनिक भी ध्यान नही रहा । उसकी सखियाँ दौड़-दौड कर जादू करने वाली को ढूँढ़ने लगी, उसकी सासु टोना करने वाली को पुकारने लगी । रसखान कहते हैं कि

व्याख्या भाग २३१ इस प्रकार सारा ब्रज वहाँ आ गया और उस गोपवधू को चारो ओर से घेर लिया। सब नर-नारी अन्य-अन्य प्रकार के उपकार बताने लगे, लेकिन किसी की भी समझ मे नही आया कि कृष्ण के हाथ से उस वैरिन बांसुरी को छीन कर जला दे, क्योकि वह उसी का तो प्रभाव था, जिसके कारण वह गोप वधू पागल हो गई थी । विशेष—बासुरी के प्रभाव का प्रभावोत्पादक वर्णन है । पाठान्तर—इस सवैया की द्वितीय पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'मात अघात न देवन पूजत सास सयानो सयानो पुकारै ।' सवैया कान्ह भए बस बाँसुरी के अब कौन सखि ! हमको चहिहै । निसद्यौस रहे सग साथ लगी यह सौतिन तापन क्यौ सहिहै ॥ जिन मोहि लियौ मन मोहन को रसखानि सदा हमको दहिहै । मिलि आओ सबै सखि ! भागि चलै अब तौ ब्रज मे बसुरी रहिहै ॥११८॥ शब्दार्थ—कान्ह=कृष्ण । चहिहै=चाहेगा, प्रेम करेगा । निसद्यौस= रात-दिन । तापन=दुखो को । दहिहै=जलती है, दुख देती है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बासुरी के प्रति सौतिया-डाह प्रकट करती है कि हे सखि ! कृष्ण तो अब बासुरी के वश मे हो गये है, अतः अब हमे कौन प्यार करेगा ? अर्थात् कृष्ण तो केवल अपनी बाँसुरी को ही प्रेम करते है, वे हमसे प्रेम नही करेगे । यह बासुरी रात-दिन उनके साथ लगी रहती है, अतः यह सौतिया दुख हमसे नही सहे जाते । इस बाँसुरी ने दूसरो का मन मोहने वाले कृष्ण का भी मन मोह लिया है, इसीलिए यह हमे सदैव दुख देती रहती है। इस दुख से छूटने का तो केवल यही उपाय है कि सारी सखियाँ इकट्ठी होकर ब्रज से भाग चले, क्योकि अब तो ब्रज मे यह बासुरी ही रहेगी । विशेष—१. नारी के सपत्नी-भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है । २ 'मोहि लियौ मन मोहन को' वाक्यांश विशेष महत्वपूर्ण है । तुलना—१. हम ब्रज बसिहैं तो बाँसुरी बसै न यह, बासुरी बसाइ कान्ह हमे विदा दीजिए । —शेख आलम २. 'धुनि सुनाय चेटक भरी, सुधि नसाय चित चैन । बंसी गिरधर घर बसी, हम घर बसी रहै न ॥' —अज्ञात

२३२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया ब्रज की वनिता सब घेरि कहैं, तेरो ढारो विगारो कहा कस री । अरी तू हमको जम काल भई नैक कान्ह गही तौ कहा रस री ॥ रसखानि भली विधि आनि बनी बसिवो नही देत दिसा दस री । हम तो ब्रज को बसिवोई तजौ बस री ब्रज वैरिन तू वसरी ॥ ११९ ॥ शब्दार्थ—ढारो = ढंग । जमकाल = मृत्यु । अर्थ—कृष्ण अपनी बाँसुरी को बहुत प्रेम करते है। उसके प्रेम को देख- कर गोपियो के मन मे उसके प्रति ईर्ष्या और जलन की भावनायें उत्पन्न हो गई है। अतः ब्रज की सारी नारिया वासुरी को घेर कर उससे पूछती हैं कि हे बांसुरी ! हममे से किसने तेरा क्या बिगाडा है जो तू हमारे लिए मृत्यु- काल के समान बन गई है ? अगर कृष्ण ने तुझे जरा सा छू लिया तो तुझे कौन सा भारी आनन्द प्राप्त हो गया । रसखान कवि कहते है कि गोपियाँ बांसुरी से कहने लगी कि अब तो हम इस परिणाम पर पहुँच गई हैं कि तू हमे यहाँ पर थोडे दिन भी नही बसने देगी। हमने तो ब्रज मे रहना ही छोड़ दिया है, इसलिए हे वैरिन बाँसुरी, तू ही अब ब्रज मे आनन्द से रह । विशेष—१. इस कवित्त मे सौतभाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है । २ अन्तिम पंक्ति मे अनुप्रास का भावपूर्ण प्रयोग है । तुलना---‘मैने छाड्यो वृज को री बसिबौ, तू ही या वृज मे वंसी री ।' —सूरदास सवैया बजी है वजी रसखानि वजी सुनिकै अब गोपकुमारी न जी है। न जी है कोऊ जो कदाचित कामिनी कान मैं वाकी जु तान कुपी है ॥ कुपी है विदेस सदेस न पावति मेरी डव देह को मैन सजी है। सजी है तौ मेरो कहा बस है सुतौ वैरिनि वासुरी फेरि वजी है ॥ १२० । शब्दार्थ—मैन = कामदेव । अर्थ—कृष्ण की बासुरी का प्रभाव-वर्णन करते हुए कवि रसखान कहते है कि कृष्ण की वासुरी बजने पर गोप-कुमारियो का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है । जिस भी कामिनी के कानो मे उस बंशी की धुनि पडती है वह कदा- चित् जीवित ही नही रह जाती; अर्थात् वशी के माधुर्य मे इतनी तन्मय हो

व्याख्या भाग २३३ जाती है कि वह स्वयं को ही भूल जाती है। किसी-किसी गोपी के मन में विरह की इतनी प्रबल वेदना जागृत हो जाती है कि वह अपने मन मे कुपित होकर कहने लगती है कि प्रियतम कितना बुरा है जो विदेश मे रह रहा है, 'पर उसने अभी तक अपना कोई भी संदेश नही भेजा, मेरे सारे शरीर मे तो अब कामदेव का संचार हो गया है, अर्थात् मन मे मिलन की उत्कंठा बहुत अधिक बढ़ गई है। इस पर यह बैरिन बाँसुरी बजकर उस विरह वेदना को और भी अधिक उत्तेजित कर देती है। इसमे मेरा कोई वश नही है। विशेष—१. सिंहावलोकन अलंकार का भावपूर्ण प्रयोग है। २. 'तान कुँपी है' मे भावोत्कर्षक शक्ति है। तुलना—'कीजै कहा राम अब जैए केहि ठाम ऐ री, फेरि वह बैंरिन बजी है वन बासुरी।' —द्विजदेव सवैया मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माला गरे पहिरौगी। ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी वन गोधन ग्वारनि संग फिरौगी॥ भाव तो वोहि मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौगी। या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौगी ॥१२८॥ शब्दार्थ—मोर पखा = मोर-मुकुट । पितम्बर = पीला वस्त्र । भावतो = प्रिय । अधरान = ओठ । अधरा = नीचे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मै मोर-मुकुट को अपने गिर के ऊपर पहनूँगी, गुंजो की माला मै पहनूँगी। पीला वस्त्र ओढ कर और हाथ मे लाठी लेकर तथा ग्वालिन बनकर बन बन मे गायो के पीछे फिरूँगी। कृष्ण मेरा प्रिय है और उसे प्राप्त करने के लिए तेरे कहने से सारा स्वाँग भर लूँगी, किन्तु कृष्ण की मुरली को, जो वे ओठो पर रक्खे रहते है, नीचे नही धरूँगी। विशेष—अंतिम पक्ति मे यमक अलंकार है। कालिय दमन कवित्त आपनो सो ढोटा हम सब ही को जानत है, दोऊ प्रानी सब ही के काज नित धावही।

२३४ रसखान-ग्रन्थावली ते तो रसखानि अब दूर ते तमासो देखैं, तरनितनूजा के निकट नहिं आवही । आन दिन बात अनहितुन सो कहौ कहा, हितू जेऊ आए ते ये लोचन दुरावही । कहा कहौ आली खाली देत सब ठाली, पर मेरे वनमाली को न काली तें छुरावही ॥१२२॥ शब्दार्थ — छोटा = पुत्र । तरनितनूजा = यमुना । अनहितुन = बुरी । हितू = मित्र । वनमाली = कृष्ण । अर्थ — यशोदा अपनी सखी से कालिय-दमन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! हम (नंद और यशोदा) दोनो सभी गोपो को अपना-सा ही पुत्र समझते है और दोनो प्रतिदिन दूसरो के काम को दौड आते है; अर्थात् सदैव दूसरो की सहायता मे तत्पर रहते है । रसखान कहते हैं कि वे ही लोग जिनकी हमने सदा सहायता की, अब दूर से ही तमाशा देख रहे हैं। कोई भी यमुना के निकट नही आता । न जाने किसी दिन हमने किससे क्या बुरी बात कह दी कि जो मित्र थे, वे भी अब आंखे चुरा रहे है; अर्थात् कोई भी कृष्ण की सहायता के लिए आगे नही बढ़ रहा है । हे सखि ! मै तुमसे क्या कहूँ । वैसे तो सब लोग कार्य-निवृत्त है, पर मेरे कृष्ण को कोई भी कालिय नाग से नही छुडा रहा है । विशेष—यशोदा की भययुक्त आतुरता का स्वाभाविक वर्णन है । पाठान्तर — इस कवित्त की पाँचवी और छठी पक्ति इस प्रकार भी मिलती है— ‘अदिन परे ते अनहितू सब भये लोग, यहै तो अजोग देखि लोचन दुरावही ।’ सवैया लोग कहैं ब्रज के रसखानि अनंदित नंद जसोमति जू पर । छोहरा आजु नयो जनम्यौ तुम सो कोऊ भाग भयौ नहि भू पर ॥ वारि कै दाम सँवार करौ अपने अपवाल कुचाल ललू पर । नाचत रावरो लाल गुजाल सो काल सो व्याल-कपाल के ऊपर ।१२३॥ शब्दार्थ — छोहरा = पुत्र, कृष्ण । दाम = धन । अपचाल कुचाल = दुर्दिन ।

व्याख्या भाग २३५. ललू पर = कृष्ण पर । ब्याल-कपाल = नाग का सिर । अर्थ—कृष्ण को कालिय नाग के सिर पर नृत्य करते हुए देखकर ब्रज के लोग आनन्दित नन्द और यशोदा से कहते है कि तुम्हारे पुत्र ने आज नया जन्म लिया है, अत इस भूमडल पर तुम जैसा कोई भाग्यशाली नही है । तुम धन का दास देकर तथा उसे कृष्ण पर न्यौछावर करके अपने दुर्दिनो को नष्ट कर लो । अव चिन्ता की कोई बात नही है, क्योकि तुम्हारा पुत्र कालिय नाग के सिर के ऊपर नाच रहा है; अर्थात् इसने नाग को पूर्णतया अपने वश मे कर लिया है । विशेष—तत्कालीन सामाजिक परम्पराओ की ओर सकेत इस सवैया मे दृष्टिगोचर होते है । तुलना— 'जनम को चाली ऐरी अद्भुत है ख्याली आजु, काली की कनाली पै नचत बनमाली है ।' —पद्माकर चीर हरण सवैया • एक समै जमुना-जल मैं सब मज्जन हेत धसी ब्रज-गोरी । त्यौ रसखानि गयौ मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की छोरी ॥ न्हाइ जबै निकसी बनिता चहु ओर चितै चित रोष करो री । हार हिये भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत बोरी ॥१२८॥ शब्दार्थ—मज्जन हेत=न्हाने के लिए । छोटी=चोटी । रोष=क्रोध । वचनामृत=अमृत जैसे सुखद वचन । बोरी=डूब गईं । अर्थ—चीरहरण लीला का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते है कि एक समय की बात है कि सब ब्रज की स्त्रियाँ नहाने के लिए यमुना के जल मे उतरी । तभी उनके वस्त्रो को लेकर श्रीकृष्ण कदम्ब वृक्ष की चोटी पर चढ गये । स्नान करके जब वे स्त्रियाँ बाहर निकली और चारो ओर देखने पर भी अपने वस्त्रो को न पा सकी तो क्रुद्ध हो गई । जब उन्होने अपनी हार स्वीकार कर ली तो अनेक प्रकार के प्रेमपूर्ण भावो से भरकर कृष्ण ने उनके वस्त्र लौटा दिये और उनसे जो प्रेमपूर्ण बाते की, उनके अमृत जैसे सुखद वचनो को सुनकर सारी स्त्रियाँ आनन्द मे डूब गई ।

२३६ रसखान-ग्रन्थाव०.. प्रेमासक्ति सवैया प्रान वही जु रहै रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ । सीस वही जिन वे परसे पद अक वही जिन वा परसायौ ॥ दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ । और कहाँ लौ कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौ ॥१२५॥ शब्दार्थ - सरल है । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वे ही प्राण हैं जो कृष्ण पर रीझ जाये, वही रूप है जो कृष्ण को रिझाले । वही सिर है जो कृष्ण के चरणो का स्पर्श करे, हृदय वही है जिससे कृष्ण का स्पर्श किया गया हो । वही दूध है जो कृष्ण ने दुहा है, वही दही है जो उसने बिखेरी है । रसखान कवि कहते हैं कि और कहाँ तक कहूँ, भाव भी वही है जो कृष्ण को अच्छा लगता है । कहने का अभिप्राय यह है कि इन्द्रियो की और भावो की सार्थकता तभी है जब वे कृष्ण को या तो अपनी ओर आकृष्ट कर सके, अथवा उसकी ओर आकृष्ट हो जाये । सवैया देखन कौ सखी नैन भए न सबै तन आवत गाइन पाछै । कान भए प्रति रोम नही सुनिबे कीँ अमीनिधि बोलनि आछै ॥ ए सजनी न सम्भारि भरै वह वाँकी विलोकनि कोर कटाछै । भूमि भयौ न हियो मेरी अली जहाँ हरि खेलत काछनी काछै ॥१२६॥ शब्दार्थ - अमीनिधि = अमृत-सागर । कटाछै = कटाक्ष । आली = सखी । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि कृष्ण गायो के पीछे आ रहे है। अच्छा होता कि मेरे सारे शरीर मे नैन होते, ताकि मैं उसकी शोभा को पूरी तरह देख पाती । अमृत-सागर से भरे हुए वह जो मीठे वचन बोलता है, उन्हे सुनने के लिए मेरे रोम-रोम मे कान क्यो नही हो गये । हे सखि ! उसकी कटाक्ष भरी हुई सुन्दर चितवन संभालने से संभाली नही जाती, अर्थात् उसका प्रभाव बिना पड़े नही रह पाता। हे सखि ! मेरा हृदय वह पृथ्वी क्यो नही बन गया, जहाँ काछनी