रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २२६ पर जाकर विष पी लेगी; अर्थात् उसके द्वारे पर जाकर आत्म-हत्या कर लेगी। विशेष—१. जी है तो जी हैं, मे यमक अलकार है। २ 'न तो पी है हलाहल नन्द के द्वारे' में मन का सारल्य एवं दृढता निहित है। झुलना—'चेतै न जो वृषभान सुता दुख ह्वै ह्वै बडो इहि की सजनीन को। जाय के खाय परेगी सबै या अहीर के द्वार पे हीर-कनीन को ॥ —अज्ञात सवैया कल- काननि कुण्डल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजति है। मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महा छबि छाजति है ॥ रसखानि लखे तन पीत पटा सत दामिनि सी दुति लाजति है। वहि बासुरी की धुनि कान परे कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥११५॥ शब्दार्थ—कल = सुन्दर । काननि = कानो मे । अधरा = होठो पर । मुसकानि-तरग = हसी की लहरे। छाजति है = शोभायमान है। सत दामिनि की = सैकड़ो बिजलियो की। दुति = द्युति, शोभा। लाजति है = लज्जित होता है। कुलकानि = वश की मर्यादा। भाजति है = भागती है। अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा तथा उनकी बांसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानो मे सुन्दर कुण्डल, सिर पर मोर-पखो का मुकट और हृदय पर वैजयन्तीमाला सुशोभित है। उनके हाथ मे वशी और होठो पर मुसकराहट की लहरें अत्यन्त शोभा प्राप्त करती है। रसखान कवि कहते है कि उनके तन पर सुशोभित पीले वस्त्र को देखकर सैकडो बिजलियो की शोभा लज्जित होती है। उसी बाँसुरी की ध्वनि कानो मे पडने पर व्रज-बनिताएँ अपने हृदय से वंश की मर्यादा छोड़ कर उसी ओर भागती है। विशेष—अनुप्रास, रूपक और प्रतीप अलकार । सवैया काल्हि भटू मुरली-धुनि मे रसखानि लियौ कहूँ नाम हमारौ। ता छिन ते भई बैरिनि सास कितौ कियौ झाँकन देति न द्वारौ ॥