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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२३० रसखान-ग्रन्थावली होत चवाव बलाई सो आली री जो भरि आँखिन भेंटिये प्यारो । वाट परी अव री ठठक्यौ हियरे अटक्यौ पियरे पटवारौ ॥ ११६ ॥ शब्दार्थ—पटू = सखी । चवाव = बदनामी की चर्चा । जो भरि आँखिन = आँखें खोलकर । वाट परी = रास्ता रुक गया । ठिठक्यौ = रुक गया । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने अपनी मुरली मे मेरा नाम बजा दिया था । तभी से मेरी सासू मेरी वैरिण हो गई है, तथा प्रयत्न करने पर भी द्वार झाँकने नही देती, अर्थात् मैं अपने घर से बाहर निकलने का बहुत प्रयत्न करती हूँ, किन्तु मेरी सासू मुझे तनिक भी बाहर नही आने देती है । हे सखि ! यदि मैं कृष्ण को तनिक भी आँखे भर कर देख लेती हूँ तो इससे मेरी भारी बदनामी होती है । जब से कृष्ण मेरे मन मे बसा है, अर्थात् कृष्ण से मुझे प्रेम हुआ है, तब से मेरा रास्ता और हृदय दोनो रुक गये है, अर्थात् न तो मैं कहीं बाहर जा सकती हूँ और न अपने हृदय से कृष्ण को ही निकाल सकती हूँ । विशेष—अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार है । पाठान्तर--इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'एक समै मुरली धुनि मे रसखान लियो उन नाम हमारो ।' सवैया आजु भटू इक गोपवधू भई बावरी नेकु न अग सम्हारै । माई सु धाइ कै टौना सो ढूँढति सास सयानी-सयानी पुकारै ॥ यौ रसखानि घिरौ सिगरौ ब्रज आन को आन उपाय विचारै । कोऊ न कान्हर के कर ते वहि वैरिणि वासरिया गहि जारै ॥११७॥ शब्दार्थ—भटू = सखी । टोना = जादू । सयानी = टोना करने वाली । आन को आन = अन्य-अन्य प्रकार के । कान्हर के = कृष्ण के । गहि जारै = लेकर जलाता है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण की बासुरी की ध्वनि सुन कर एक गोप वधू पागल हो गई, उसे अपने अगो की सम्हालने का तनिक भी ध्यान नही रहा । उसकी सखियाँ दौड़-दौड कर जादू करने वाली को ढूँढ़ने लगी, उसकी सासु टोना करने वाली को पुकारने लगी । रसखान कहते हैं कि