रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २३१ इस प्रकार सारा ब्रज वहाँ आ गया और उस गोपवधू को चारो ओर से घेर लिया। सब नर-नारी अन्य-अन्य प्रकार के उपकार बताने लगे, लेकिन किसी की भी समझ मे नही आया कि कृष्ण के हाथ से उस वैरिन बांसुरी को छीन कर जला दे, क्योकि वह उसी का तो प्रभाव था, जिसके कारण वह गोप वधू पागल हो गई थी । विशेष—बासुरी के प्रभाव का प्रभावोत्पादक वर्णन है । पाठान्तर—इस सवैया की द्वितीय पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'मात अघात न देवन पूजत सास सयानो सयानो पुकारै ।' सवैया कान्ह भए बस बाँसुरी के अब कौन सखि ! हमको चहिहै । निसद्यौस रहे सग साथ लगी यह सौतिन तापन क्यौ सहिहै ॥ जिन मोहि लियौ मन मोहन को रसखानि सदा हमको दहिहै । मिलि आओ सबै सखि ! भागि चलै अब तौ ब्रज मे बसुरी रहिहै ॥११८॥ शब्दार्थ—कान्ह=कृष्ण । चहिहै=चाहेगा, प्रेम करेगा । निसद्यौस= रात-दिन । तापन=दुखो को । दहिहै=जलती है, दुख देती है । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बासुरी के प्रति सौतिया-डाह प्रकट करती है कि हे सखि ! कृष्ण तो अब बासुरी के वश मे हो गये है, अतः अब हमे कौन प्यार करेगा ? अर्थात् कृष्ण तो केवल अपनी बाँसुरी को ही प्रेम करते है, वे हमसे प्रेम नही करेगे । यह बासुरी रात-दिन उनके साथ लगी रहती है, अतः यह सौतिया दुख हमसे नही सहे जाते । इस बाँसुरी ने दूसरो का मन मोहने वाले कृष्ण का भी मन मोह लिया है, इसीलिए यह हमे सदैव दुख देती रहती है। इस दुख से छूटने का तो केवल यही उपाय है कि सारी सखियाँ इकट्ठी होकर ब्रज से भाग चले, क्योकि अब तो ब्रज मे यह बासुरी ही रहेगी । विशेष—१. नारी के सपत्नी-भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है । २ 'मोहि लियौ मन मोहन को' वाक्यांश विशेष महत्वपूर्ण है । तुलना—१. हम ब्रज बसिहैं तो बाँसुरी बसै न यह, बासुरी बसाइ कान्ह हमे विदा दीजिए । —शेख आलम २. 'धुनि सुनाय चेटक भरी, सुधि नसाय चित चैन । बंसी गिरधर घर बसी, हम घर बसी रहै न ॥' —अज्ञात