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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२३२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया ब्रज की वनिता सब घेरि कहैं, तेरो ढारो विगारो कहा कस री । अरी तू हमको जम काल भई नैक कान्ह गही तौ कहा रस री ॥ रसखानि भली विधि आनि बनी बसिवो नही देत दिसा दस री । हम तो ब्रज को बसिवोई तजौ बस री ब्रज वैरिन तू वसरी ॥ ११९ ॥ शब्दार्थ—ढारो = ढंग । जमकाल = मृत्यु । अर्थ—कृष्ण अपनी बाँसुरी को बहुत प्रेम करते है। उसके प्रेम को देख- कर गोपियो के मन मे उसके प्रति ईर्ष्या और जलन की भावनायें उत्पन्न हो गई है। अतः ब्रज की सारी नारिया वासुरी को घेर कर उससे पूछती हैं कि हे बांसुरी ! हममे से किसने तेरा क्या बिगाडा है जो तू हमारे लिए मृत्यु- काल के समान बन गई है ? अगर कृष्ण ने तुझे जरा सा छू लिया तो तुझे कौन सा भारी आनन्द प्राप्त हो गया । रसखान कवि कहते है कि गोपियाँ बांसुरी से कहने लगी कि अब तो हम इस परिणाम पर पहुँच गई हैं कि तू हमे यहाँ पर थोडे दिन भी नही बसने देगी। हमने तो ब्रज मे रहना ही छोड़ दिया है, इसलिए हे वैरिन बाँसुरी, तू ही अब ब्रज मे आनन्द से रह । विशेष—१. इस कवित्त मे सौतभाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है । २ अन्तिम पंक्ति मे अनुप्रास का भावपूर्ण प्रयोग है । तुलना---‘मैने छाड्यो वृज को री बसिबौ, तू ही या वृज मे वंसी री ।' —सूरदास सवैया बजी है वजी रसखानि वजी सुनिकै अब गोपकुमारी न जी है। न जी है कोऊ जो कदाचित कामिनी कान मैं वाकी जु तान कुपी है ॥ कुपी है विदेस सदेस न पावति मेरी डव देह को मैन सजी है। सजी है तौ मेरो कहा बस है सुतौ वैरिनि वासुरी फेरि वजी है ॥ १२० । शब्दार्थ—मैन = कामदेव । अर्थ—कृष्ण की बासुरी का प्रभाव-वर्णन करते हुए कवि रसखान कहते है कि कृष्ण की वासुरी बजने पर गोप-कुमारियो का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है । जिस भी कामिनी के कानो मे उस बंशी की धुनि पडती है वह कदा- चित् जीवित ही नही रह जाती; अर्थात् वशी के माधुर्य मे इतनी तन्मय हो

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