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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २३३ जाती है कि वह स्वयं को ही भूल जाती है। किसी-किसी गोपी के मन में विरह की इतनी प्रबल वेदना जागृत हो जाती है कि वह अपने मन मे कुपित होकर कहने लगती है कि प्रियतम कितना बुरा है जो विदेश मे रह रहा है, 'पर उसने अभी तक अपना कोई भी संदेश नही भेजा, मेरे सारे शरीर मे तो अब कामदेव का संचार हो गया है, अर्थात् मन मे मिलन की उत्कंठा बहुत अधिक बढ़ गई है। इस पर यह बैरिन बाँसुरी बजकर उस विरह वेदना को और भी अधिक उत्तेजित कर देती है। इसमे मेरा कोई वश नही है। विशेष—१. सिंहावलोकन अलंकार का भावपूर्ण प्रयोग है। २. 'तान कुँपी है' मे भावोत्कर्षक शक्ति है। तुलना—'कीजै कहा राम अब जैए केहि ठाम ऐ री, फेरि वह बैंरिन बजी है वन बासुरी।' —द्विजदेव सवैया मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माला गरे पहिरौगी। ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी वन गोधन ग्वारनि संग फिरौगी॥ भाव तो वोहि मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौगी। या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौगी ॥१२८॥ शब्दार्थ—मोर पखा = मोर-मुकुट । पितम्बर = पीला वस्त्र । भावतो = प्रिय । अधरान = ओठ । अधरा = नीचे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मै मोर-मुकुट को अपने गिर के ऊपर पहनूँगी, गुंजो की माला मै पहनूँगी। पीला वस्त्र ओढ कर और हाथ मे लाठी लेकर तथा ग्वालिन बनकर बन बन मे गायो के पीछे फिरूँगी। कृष्ण मेरा प्रिय है और उसे प्राप्त करने के लिए तेरे कहने से सारा स्वाँग भर लूँगी, किन्तु कृष्ण की मुरली को, जो वे ओठो पर रक्खे रहते है, नीचे नही धरूँगी। विशेष—अंतिम पक्ति मे यमक अलंकार है। कालिय दमन कवित्त आपनो सो ढोटा हम सब ही को जानत है, दोऊ प्रानी सब ही के काज नित धावही।