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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२३४ रसखान-ग्रन्थावली ते तो रसखानि अब दूर ते तमासो देखैं, तरनितनूजा के निकट नहिं आवही । आन दिन बात अनहितुन सो कहौ कहा, हितू जेऊ आए ते ये लोचन दुरावही । कहा कहौ आली खाली देत सब ठाली, पर मेरे वनमाली को न काली तें छुरावही ॥१२२॥ शब्दार्थ — छोटा = पुत्र । तरनितनूजा = यमुना । अनहितुन = बुरी । हितू = मित्र । वनमाली = कृष्ण । अर्थ — यशोदा अपनी सखी से कालिय-दमन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! हम (नंद और यशोदा) दोनो सभी गोपो को अपना-सा ही पुत्र समझते है और दोनो प्रतिदिन दूसरो के काम को दौड आते है; अर्थात् सदैव दूसरो की सहायता मे तत्पर रहते है । रसखान कहते हैं कि वे ही लोग जिनकी हमने सदा सहायता की, अब दूर से ही तमाशा देख रहे हैं। कोई भी यमुना के निकट नही आता । न जाने किसी दिन हमने किससे क्या बुरी बात कह दी कि जो मित्र थे, वे भी अब आंखे चुरा रहे है; अर्थात् कोई भी कृष्ण की सहायता के लिए आगे नही बढ़ रहा है । हे सखि ! मै तुमसे क्या कहूँ । वैसे तो सब लोग कार्य-निवृत्त है, पर मेरे कृष्ण को कोई भी कालिय नाग से नही छुडा रहा है । विशेष—यशोदा की भययुक्त आतुरता का स्वाभाविक वर्णन है । पाठान्तर — इस कवित्त की पाँचवी और छठी पक्ति इस प्रकार भी मिलती है— ‘अदिन परे ते अनहितू सब भये लोग, यहै तो अजोग देखि लोचन दुरावही ।’ सवैया लोग कहैं ब्रज के रसखानि अनंदित नंद जसोमति जू पर । छोहरा आजु नयो जनम्यौ तुम सो कोऊ भाग भयौ नहि भू पर ॥ वारि कै दाम सँवार करौ अपने अपवाल कुचाल ललू पर । नाचत रावरो लाल गुजाल सो काल सो व्याल-कपाल के ऊपर ।१२३॥ शब्दार्थ — छोहरा = पुत्र, कृष्ण । दाम = धन । अपचाल कुचाल = दुर्दिन ।