रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २३५. ललू पर = कृष्ण पर । ब्याल-कपाल = नाग का सिर । अर्थ—कृष्ण को कालिय नाग के सिर पर नृत्य करते हुए देखकर ब्रज के लोग आनन्दित नन्द और यशोदा से कहते है कि तुम्हारे पुत्र ने आज नया जन्म लिया है, अत इस भूमडल पर तुम जैसा कोई भाग्यशाली नही है । तुम धन का दास देकर तथा उसे कृष्ण पर न्यौछावर करके अपने दुर्दिनो को नष्ट कर लो । अव चिन्ता की कोई बात नही है, क्योकि तुम्हारा पुत्र कालिय नाग के सिर के ऊपर नाच रहा है; अर्थात् इसने नाग को पूर्णतया अपने वश मे कर लिया है । विशेष—तत्कालीन सामाजिक परम्पराओ की ओर सकेत इस सवैया मे दृष्टिगोचर होते है । तुलना— 'जनम को चाली ऐरी अद्भुत है ख्याली आजु, काली की कनाली पै नचत बनमाली है ।' —पद्माकर चीर हरण सवैया • एक समै जमुना-जल मैं सब मज्जन हेत धसी ब्रज-गोरी । त्यौ रसखानि गयौ मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की छोरी ॥ न्हाइ जबै निकसी बनिता चहु ओर चितै चित रोष करो री । हार हिये भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत बोरी ॥१२८॥ शब्दार्थ—मज्जन हेत=न्हाने के लिए । छोटी=चोटी । रोष=क्रोध । वचनामृत=अमृत जैसे सुखद वचन । बोरी=डूब गईं । अर्थ—चीरहरण लीला का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते है कि एक समय की बात है कि सब ब्रज की स्त्रियाँ नहाने के लिए यमुना के जल मे उतरी । तभी उनके वस्त्रो को लेकर श्रीकृष्ण कदम्ब वृक्ष की चोटी पर चढ गये । स्नान करके जब वे स्त्रियाँ बाहर निकली और चारो ओर देखने पर भी अपने वस्त्रो को न पा सकी तो क्रुद्ध हो गई । जब उन्होने अपनी हार स्वीकार कर ली तो अनेक प्रकार के प्रेमपूर्ण भावो से भरकर कृष्ण ने उनके वस्त्र लौटा दिये और उनसे जो प्रेमपूर्ण बाते की, उनके अमृत जैसे सुखद वचनो को सुनकर सारी स्त्रियाँ आनन्द मे डूब गई ।