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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

२३६ रसखान-ग्रन्थाव०.. प्रेमासक्ति सवैया प्रान वही जु रहै रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ । सीस वही जिन वे परसे पद अक वही जिन वा परसायौ ॥ दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ । और कहाँ लौ कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौ ॥१२५॥ शब्दार्थ - सरल है । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वे ही प्राण हैं जो कृष्ण पर रीझ जाये, वही रूप है जो कृष्ण को रिझाले । वही सिर है जो कृष्ण के चरणो का स्पर्श करे, हृदय वही है जिससे कृष्ण का स्पर्श किया गया हो । वही दूध है जो कृष्ण ने दुहा है, वही दही है जो उसने बिखेरी है । रसखान कवि कहते हैं कि और कहाँ तक कहूँ, भाव भी वही है जो कृष्ण को अच्छा लगता है । कहने का अभिप्राय यह है कि इन्द्रियो की और भावो की सार्थकता तभी है जब वे कृष्ण को या तो अपनी ओर आकृष्ट कर सके, अथवा उसकी ओर आकृष्ट हो जाये । सवैया देखन कौ सखी नैन भए न सबै तन आवत गाइन पाछै । कान भए प्रति रोम नही सुनिबे कीँ अमीनिधि बोलनि आछै ॥ ए सजनी न सम्भारि भरै वह वाँकी विलोकनि कोर कटाछै । भूमि भयौ न हियो मेरी अली जहाँ हरि खेलत काछनी काछै ॥१२६॥ शब्दार्थ - अमीनिधि = अमृत-सागर । कटाछै = कटाक्ष । आली = सखी । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि कृष्ण गायो के पीछे आ रहे है। अच्छा होता कि मेरे सारे शरीर मे नैन होते, ताकि मैं उसकी शोभा को पूरी तरह देख पाती । अमृत-सागर से भरे हुए वह जो मीठे वचन बोलता है, उन्हे सुनने के लिए मेरे रोम-रोम मे कान क्यो नही हो गये । हे सखि ! उसकी कटाक्ष भरी हुई सुन्दर चितवन संभालने से संभाली नही जाती, अर्थात् उसका प्रभाव बिना पड़े नही रह पाता। हे सखि ! मेरा हृदय वह पृथ्वी क्यो नही बन गया, जहाँ काछनी