भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २३७ पहनकर कृष्ण खेलते है । तुलना-१. 'देखिबे को स्याम सोम देतो दृग रोम-रोम, कीनो सो न बिधि औ अविधि कीनी पलके ।' —सोमनाथ २. 'चाहित जुगल किसोर लखि ,लोचन जुगल अनेक ।' —बिहारी ३. 'कीजै कहा राम, स्याम आनन बिलोकिबे को, विरचि बिरचि न अनन्त अँखिया दई ।' —पद्माकर सवैया मोरपखा मुरली बनमाल लखे हिय को हियरा उमह्यौ री, ता दिन ते इन बैरिनि को कहि कौन न बोल कुबोल सह्यौ री ॥ तौ रसखानि सनेह लग्यौ कोउ एक कह्यौ कोउ लाख कह्यौ री ॥ और तो रग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगी सोह रग रह्यौरी ॥१२१॥ शब्दार्थ—मोरपखा=मोर-पखो का मुकुट । उमह्यौ=उमड़ रहा है । बोल-कुबोल=अच्छी-बुरी । रसखनि=आनन्द-सागर कृष्ण । रग=आदत । रंग=प्रेम । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि जिस दिन से मैंने मोर-पखो का मुकुट, मुरली और बनमाल को धारण करने वाले कृष्ण को देखा है और मेरे हृदय का भी हृदय उमड़ रहा है, उस दिन से इन बैरिन बदनामी करने वाली स्त्रियो की कौन-सी ऐसी अच्छी और बुरी बात है, जो मैने नही सही । जब आनन्द- सागर कृष्ण से प्रेम हो ही गया है तो चाहे कोई एक कहे या लाख कहे, यह प्रेम नही छूट सकता । मुझे और तो आदत रही चाहे न रही, पर कृष्ण के प्रेम मे इस प्रकार र ग गई हूँ कि अब यही रग शेष रह गया है । विशेष—१. यमक, छेकानुप्रास अलंकारो का भाव पूर्ण प्रयोग है । २ प्रेम की मान्यता वर्णित है । पाठांतर—इस सवैये की अतिम दो पक्तियाँ इस प्रकार भी मिलती है— 'अब तो रसखान सो नेह लग्यौ कोउ एक कह्यो किन लाख कह्यौ री । और सो रंग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगीले सो रंग रह्यौ री ।'