रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
व्याख्या भाग २३५. ललू पर = कृष्ण पर । ब्याल-कपाल = नाग का सिर । अर्थ—कृष्ण को कालिय नाग के सिर पर नृत्य करते हुए देखकर ब्रज के लोग आनन्दित नन्द और यशोदा से कहते है कि तुम्हारे पुत्र ने आज नया जन्म लिया है, अत इस भूमडल पर तुम जैसा कोई भाग्यशाली नही है । तुम धन का दास देकर तथा उसे कृष्ण पर न्यौछावर करके अपने दुर्दिनो को नष्ट कर लो । अव चिन्ता की कोई बात नही है, क्योकि तुम्हारा पुत्र कालिय नाग के सिर के ऊपर नाच रहा है; अर्थात् इसने नाग को पूर्णतया अपने वश मे कर लिया है । विशेष—तत्कालीन सामाजिक परम्पराओ की ओर सकेत इस सवैया मे दृष्टिगोचर होते है । तुलना— 'जनम को चाली ऐरी अद्भुत है ख्याली आजु, काली की कनाली पै नचत बनमाली है ।' —पद्माकर चीर हरण सवैया • एक समै जमुना-जल मैं सब मज्जन हेत धसी ब्रज-गोरी । त्यौ रसखानि गयौ मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की छोरी ॥ न्हाइ जबै निकसी बनिता चहु ओर चितै चित रोष करो री । हार हिये भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत बोरी ॥१२८॥ शब्दार्थ—मज्जन हेत=न्हाने के लिए । छोटी=चोटी । रोष=क्रोध । वचनामृत=अमृत जैसे सुखद वचन । बोरी=डूब गईं । अर्थ—चीरहरण लीला का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते है कि एक समय की बात है कि सब ब्रज की स्त्रियाँ नहाने के लिए यमुना के जल मे उतरी । तभी उनके वस्त्रो को लेकर श्रीकृष्ण कदम्ब वृक्ष की चोटी पर चढ गये । स्नान करके जब वे स्त्रियाँ बाहर निकली और चारो ओर देखने पर भी अपने वस्त्रो को न पा सकी तो क्रुद्ध हो गई । जब उन्होने अपनी हार स्वीकार कर ली तो अनेक प्रकार के प्रेमपूर्ण भावो से भरकर कृष्ण ने उनके वस्त्र लौटा दिये और उनसे जो प्रेमपूर्ण बाते की, उनके अमृत जैसे सुखद वचनो को सुनकर सारी स्त्रियाँ आनन्द मे डूब गई ।
२३६ रसखान-ग्रन्थाव०.. प्रेमासक्ति सवैया प्रान वही जु रहै रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ । सीस वही जिन वे परसे पद अक वही जिन वा परसायौ ॥ दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ । और कहाँ लौ कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौ ॥१२५॥ शब्दार्थ - सरल है । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वे ही प्राण हैं जो कृष्ण पर रीझ जाये, वही रूप है जो कृष्ण को रिझाले । वही सिर है जो कृष्ण के चरणो का स्पर्श करे, हृदय वही है जिससे कृष्ण का स्पर्श किया गया हो । वही दूध है जो कृष्ण ने दुहा है, वही दही है जो उसने बिखेरी है । रसखान कवि कहते हैं कि और कहाँ तक कहूँ, भाव भी वही है जो कृष्ण को अच्छा लगता है । कहने का अभिप्राय यह है कि इन्द्रियो की और भावो की सार्थकता तभी है जब वे कृष्ण को या तो अपनी ओर आकृष्ट कर सके, अथवा उसकी ओर आकृष्ट हो जाये । सवैया देखन कौ सखी नैन भए न सबै तन आवत गाइन पाछै । कान भए प्रति रोम नही सुनिबे कीँ अमीनिधि बोलनि आछै ॥ ए सजनी न सम्भारि भरै वह वाँकी विलोकनि कोर कटाछै । भूमि भयौ न हियो मेरी अली जहाँ हरि खेलत काछनी काछै ॥१२६॥ शब्दार्थ - अमीनिधि = अमृत-सागर । कटाछै = कटाक्ष । आली = सखी । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि कृष्ण गायो के पीछे आ रहे है। अच्छा होता कि मेरे सारे शरीर मे नैन होते, ताकि मैं उसकी शोभा को पूरी तरह देख पाती । अमृत-सागर से भरे हुए वह जो मीठे वचन बोलता है, उन्हे सुनने के लिए मेरे रोम-रोम मे कान क्यो नही हो गये । हे सखि ! उसकी कटाक्ष भरी हुई सुन्दर चितवन संभालने से संभाली नही जाती, अर्थात् उसका प्रभाव बिना पड़े नही रह पाता। हे सखि ! मेरा हृदय वह पृथ्वी क्यो नही बन गया, जहाँ काछनी
व्याख्या भाग २३७ पहनकर कृष्ण खेलते है । तुलना-१. 'देखिबे को स्याम सोम देतो दृग रोम-रोम, कीनो सो न बिधि औ अविधि कीनी पलके ।' —सोमनाथ २. 'चाहित जुगल किसोर लखि ,लोचन जुगल अनेक ।' —बिहारी ३. 'कीजै कहा राम, स्याम आनन बिलोकिबे को, विरचि बिरचि न अनन्त अँखिया दई ।' —पद्माकर सवैया मोरपखा मुरली बनमाल लखे हिय को हियरा उमह्यौ री, ता दिन ते इन बैरिनि को कहि कौन न बोल कुबोल सह्यौ री ॥ तौ रसखानि सनेह लग्यौ कोउ एक कह्यौ कोउ लाख कह्यौ री ॥ और तो रग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगी सोह रग रह्यौरी ॥१२१॥ शब्दार्थ—मोरपखा=मोर-पखो का मुकुट । उमह्यौ=उमड़ रहा है । बोल-कुबोल=अच्छी-बुरी । रसखनि=आनन्द-सागर कृष्ण । रग=आदत । रंग=प्रेम । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि जिस दिन से मैंने मोर-पखो का मुकुट, मुरली और बनमाल को धारण करने वाले कृष्ण को देखा है और मेरे हृदय का भी हृदय उमड़ रहा है, उस दिन से इन बैरिन बदनामी करने वाली स्त्रियो की कौन-सी ऐसी अच्छी और बुरी बात है, जो मैने नही सही । जब आनन्द- सागर कृष्ण से प्रेम हो ही गया है तो चाहे कोई एक कहे या लाख कहे, यह प्रेम नही छूट सकता । मुझे और तो आदत रही चाहे न रही, पर कृष्ण के प्रेम मे इस प्रकार र ग गई हूँ कि अब यही रग शेष रह गया है । विशेष—१. यमक, छेकानुप्रास अलंकारो का भाव पूर्ण प्रयोग है । २ प्रेम की मान्यता वर्णित है । पाठांतर—इस सवैये की अतिम दो पक्तियाँ इस प्रकार भी मिलती है— 'अब तो रसखान सो नेह लग्यौ कोउ एक कह्यो किन लाख कह्यौ री । और सो रंग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगीले सो रंग रह्यौ री ।'
२३८ रसखान-ग्रन्थावली झुलना-१. 'तुम गाँवरे नांवरे कोऊ घरो हम साँवरे रंग रंगी सो रंगी।' २. 'अब कोऊ कितैऊ कहै किनरी जु ही स्याम के रंग रंगी सो रंगी।' —द्विजदेव ३. 'रंग दूसरो और चढ़ैगो नही अलि साँवरो रंग रग्यो सो रग्यो।' —हरिश्चन्द्र सवैया वन बाग तडागनि कु जगली अखियाँ सुख पाइहै देखि दई। अब गोकुल माँझ विलोकियैगी वह गोप सभाग सुभाय रई॥ मिलिहै हँसि गाइ कवै रसखानि कवै ब्रजवालनि प्रेम भई। वह नील निचोल के घूँघट की छवि देखबी देखन लाज लई ॥१२८॥ शब्दार्थ—सभाग = भाग्यशाली। रई = युक्त। निचोल = वस्त्र। लाज- लई = लज्जा युक्त। अर्थ-कोई गोपी अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण को वन मे, बाग मे, तड़ागो मे और कुंज-गलियो मे देखकर तो मेरी आँखो ने सुख प्राप्त कर लिया है, अब मेरी इच्छा यह है कि उस भाग्य- शाली सुन्दरता से युक्त कृष्ण को गोकुल के बीच कब देखू गी। वह कृष्ण प्रेममयी, ब्रज-बालाओ के मध्य मे कब हंसकर तथा मिलकर रासलीला करेगा ? और मैं कब अपने पीले वस्त्र के घूघट के बीच से लज्जायुक्त होकर उसकी शोभा देखूंगी। पाठान्तर—वन बाग तडागन कुंज गली अखियां सुख पाइ है देखि दई । कब गोकुल माँझ विलोकैहिगी छवि सो वह गोप सभा गरई । मिलि हैं हँसि गारी दै के रसखान कवै ब्रज वालनि प्रेम मई। वह नील निचोल के घूँघट की कब देखवी देखन लाज लई ॥ सवैया काल्हि पऱ्यी मुरली-धुनि मैं रसखानि जू कानन नाम हमारो। ता दिन ते नहिं धीर रखो जग जानि लयो अति कीनौ पँवारो ॥ गाँवन गाँवन मैं अब तौ बदनाम भई सब सो कै किनारो। तौ सजनी फिरि फेरि कहौं पिय मेरो वही जग ठोकि नगारो ॥१२६॥ शब्दार्थ—काल्हि = कल। कानन = कानो मे। पँवारो = झंझट। सब सों
व्याख्या भाग २३६ कै किनारो = सब से ही किनारा कर लिया, सबसे अलग हो गई । ठोकि नगारो = नगारा बजाकर । अर्थ —मुरली के प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! कल आनन्द-सागर कृष्ण के द्वारा मुरली मे लिया हुआ मेरा नाम जब मेरे कानो मे पडा तो उसी दिन से (उसी समय से) मेरे मन का धैर्य जाता रहा । सारे संसार को यह मालूम हो गया है कि मैने अपनी जान को झंझट पाल लिया है । कृष्ण से प्रेम करने के कारण अब तो मैं प्रत्येक गाँव मे बदनाम हो गई हूँ, इसीलिए सबसे अलग भी हो गई हूँ । इसीलिए हे सजनी ! मैं तुझ से फिर उसी बात को दोहराती हूँ कि कृष्ण ही मेरा प्रियतम है । इस बात को मै संसार मे नगारा पीटकर कह रही हूँ । विशेष—इस सवैये मे 'सब सो कै किनारो,' और 'ठोकि नगारो' मुहावरों का भावपूर्ण प्रयोग है । सवैया देखि हौ आँखिन सो पिय को अरु कानन सो उन बैन को प्यारी । बाके अनगनि रंगनि की सुरभीनि सुगन्धनि नाक मैं डारो ॥ त्यौ रसखानि हिये मैं धरौ वहि सांवरी मूरति मैन उजारी । गाँव भरौ कोउ नाँव धरौ पुनि साँवरी हो बनिहो सुकुमारी ॥१३०॥ शब्दार्थ—कानन सो = कानो से । सुरभीनि सुगन्धनि = नाना प्रकार को सुगन्धियो की गन्ध । मैन-उजारी = कामदेव से सुन्दर । नाव धरौ = नाम करो, निन्दा करो । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि मैं अब इन अपनी आँखो से केवल प्रियतम कृष्ण का ही दर्शन करूँगी और इन कानो से केवल उनकी प्रिय बासुरी को ही सुनूँगी । उसके बाँके कामदेव जैसी छवि की नाना प्रकार की सुगन्धियो की गन्ध को अपनी नाक मे डालूगी । इस प्रकार मै उस आनन्द सागर की कामदेव से भी सुन्दर मूर्ति को अपने हृदय मे धारण करूँगी । अब चाहे गाँव के सारे निवासी मेरी कितनी ही निन्दा करे मैं कृष्ण के प्रति अपने अचल अनुराग को नही छोड़ूँगी ।
२४० रसखान-ग्रन्थावली सवैया तुम चाहो सो कहौ हम तौ नन्दवारे के संग ठईं सो ठईं । तुम ही कुलवौने प्रवीने सबै हम ही कुछ छाडि गईं सो गईं । रसखान यो प्रीत की रीत नई सु कलंक की मोटैं लई सो लईं । यह गाव के वासी हँसै सो हँसै हम स्याम की दासी भई सो भईं ॥१३१॥ शब्दार्थ—नन्दवारे के संग=कृष्ण के साथ । ठईं सो ठईं =दृढ़ सकल्प करके मिल चुकी है । कुलवीने=कुलवान । मोटैं=गठरियाँ । अर्थ—गोपिया किसी अन्य गोपी से जो उन्हे कृष्ण प्रेम से विरत करना चाहती है, कहती है कि तुम जो चाहो हम को कह लो , लेकिन हम तो दृढ़ संकल्प करके कृष्ण के साथ मिल चुकी है, अर्थात् उससे प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर चुकी हैं । तुम ही सब प्रकार से कुलवती और प्रवीण सही, पर हमने तो कुल की मर्यादा को तिलाजलि दे दी है । हमारे प्रेम की यह रीति नही है, हमे जो भी बदनामी की गठरिया मिली हैं, उन्हे हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया है । अब चाहे हमारे ग्राम के निवासी हम पर कितना ही हँसें, पर हम तो कृष्ण की दासी बन ही चुकी हैं । विशेष—१. गोपियो के अनन्य प्रेम की सुन्दर व्यंजना है । २. वीप्सा अलकार का प्रयोग प्रभावोत्पादक है । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है । सवैया मोर पखा धरे चारिक चारु विराजत कोटि अमेठनि फैंटो । गुंज छरा रसखान विसाल अनग लजावत अंग करैंटो । ऊँचे अटा चढि एड़ी ऊँचाइ हितौ हुलसाय कैं हौंस लपेटो । हौ कब के लखि हौं भरि आँखिन आवत गोधन धूरि घुरैंटो ।१३२। शब्दार्थ—चारिक=चार-एक अर्थात् थोडे-से । कोटि अमेठनि फैंटो = करोड़ो पेचो से युक्त पगड़ी । गुंजछरा=गुंज की माला, एक आभूषण विशेष । अनग=कामदेव । अंग करैंटो=स्याम शरीर । हौंस=अभिलाषा । भरि आँखिन=आँखो मे भरकर । गोधन धूर धुरैंटो=गोओ की धूल से भूसरित । अर्थ—शाम को घर लौटते हुए कृष्ण की शोभा का वर्णन कोई गोपी-
व्याख्या भाग २४१ अपनी सखी से करती हुई कह रही है कि हे सखि ! वह सिर पर थोडे-से मोर-पंखो का मुकुट धारण किए हुए है। उनकी करोडो पेचो से युक्त पगडी अत्यन्त शोभायमान हो रही है। उनके हृदय पर पडी हुई विशाल गुंजमाला तथा श्याम शरीर कामदेव को भी लज्जित करता है। मैने उन्हे ऊँची अटारी पर चढ कर तथा उचक कर हृदय मे हुलस कर अनेक अभि- लाषाओ से युक्त होकर देखा है। मै गौओ की धूल से धूसरित होकर आते हुए कृष्ण को बहुत देर से आँखे भरकर देख रही हूँ। विशेष—१ तृतीय पंक्ति मे औत्सुक्य भावो की सुन्दर योजना है। २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र सम्पादित 'रसखान ग्रंथावली' मे नही है। सवैया कुंजनि कुंजनि गुंज के पुंजनि मजु लतानि सौ माल बनैबो। मालती मल्लिका कुंद सौ गूंदि हरा हरि के हियरा पहिरैबो॥ आली कबै इन भावने भाइन आपुन रीझि कै प्यारे रिझैवो। माइ भकै हरि हाँकरिबो रसखानि तकै फिरि कै मुसकैबो॥१३३॥ शब्दार्थ—पुंजनि=समूह । हरा=हार । आली=सखी । भावते भाइन=प्रिय भाव। हाकरिबौ=पुकारना। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि कुंज-कुंज के गुंजो के समूहो को इकट्ठा करके उनकी सुन्दर लताओ से माला बनाऊँगी। मालती मल्लिका और कुंदो से हार गूँथकर कृष्ण के हृदय पर पहनाऊँगी. हे सखि ! न जाने कब इन प्रिय भावो से स्वय ही रीझकर अपने प्रिय कृष्ण को स्थिर पाऊँगी। मै यथाशक्ति उन्हे पुका- रूंगी. वे पीछे की ओर देखेगे और तब मै उनकी ओर मुडकर पुरस्कार दूँगी। पाठान्तर—इस सवैया की चौथी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'पाइ लुकै दुरि हाँ करिबो रसखान तकै फिरि कै मुसकैवो।' सवैया सब धीरज क्यो न धरौ सजनी पिय तो तुम सो अनुरागेइगौ। जब जोग संजोग को आन बनै तब जोग विजोग को मानेइगौ।
२४२ रसखान-ग्रन्थावली निसचै निरधार धरौ जिय मे रसखान सर्व रस पावेडगी । जिनके मन सो मन लागि रहे तिनके तन माँ तन लागेइगो ॥१३४॥ शब्दार्थ — अनुरागेइगी = अवश्य प्रेम करेगा । निसचै = निश्चय । रस = आनन्द । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि ! तू सब प्रकार से अपने मन मे धैर्य धारण कर, क्योंकि एक न एक दिन प्रियतम कृष्ण तुमसे अवश्य प्रेम करेगा । जब मिलने का समय आयेगा तो वियोग की घडियाँ नष्ट हो जाएँगी । तुम निश्चय ही अपने हृदय मे धैर्य धारण करो, क्योकि तुम आनन्द-सागर कृष्ण से अवश्य आनंद प्राप्त करोगी । जिसके मन मे तेरा मन लगा हुआ है, उसके शरीर मे भी तेरे शरीर का मिलन होगा । विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें । उनही की सुनै न औ बैन त्यौं सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें ॥ उनही सँग डोलन मैं रसखान सबै सुखसिन्धु अघानी रहें । उनही बिन ज्यों जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी असुवानी रहें ॥१३५॥ शब्दार्थ — सनेहन = प्रेम । सानी रहें = परिपूर्ण रहती है । अघानी = तृप्त । अर्थ — अपनी प्रेमावस्था का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! मेरा मन उसी कृष्ण के प्रेम से परिपूर्ण रहता है, मैं उन्ही के प्रेम मे पागल बनी हुई हूँ । मेरे कान केवल उन्ही की बातो को सुनते हैं, और किसी प्रकार की वाणी को नही सुनते । उनकी चितवन ही मुझे अनेक प्रकार से आनंद प्रदान करती है । मैं उन्ही के साथ रहने मे इतना सुख-सागर प्राप्त कर लेती हू कि पूर्णतया तृप्त हो जाती हूँ । उनके बिना मेरी आँखे आँसुओ मे डूबकर इस प्रकार तडपती रहती है जिस प्रकार पानी के बिना मछली । विशेष — १. आनन्द-भाव के प्रेम का वर्णन है । २. उपमा अलकार ।
व्याख्या भाग २४३ प्रेम-बन्धन सवैया चंदन खोर पै बिन्दु लगाय कै कु जन ते निकस्यौ मुसकातो । राजत है बनमाल गरे अरु मोरपखा सिर पै फहरातो । मै जब ते रसखान बिलोकति ही कछु और न मोहि सुहातो । प्रीति की रीति मे लाज कहा सखि है सब सो बडनेह को नातो ॥१३६॥ शब्दार्थ—खोर=तिलक । नेह=प्रेम । बड=बडा, महत्वपूर्ण । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! चन्दन के तिलक पर बिन्दी लगाकर कृष्ण मुस्कराता हुआ कुंजो से निकला । उसके गले मे बनमाला सुशोभित थी और सिर पर मोर-पखो का मुकुट फहरा रहा था । मैने जब से आनन्द-सागर कृष्ण की इस शोभा को देखा है तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता । हे सखि ! प्रेम की रीति मे लज्जा त्याज्य है, क्योकि प्रेम का सम्बन्ध सबसे बड़ा सम्बन्ध है । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रथावली' मे नही है । सवैया कौन को लाल सलोनी सखी वह जाकी बडी अँखियाँ अनियारी । जोहन बक बिसाल के बाननि बेधत है घट तीछन भारी ॥ रसखानि सम्हारि परै नहि चोट सु कोटि उपाय करे सुखकारी । भाल लिख्यौ विधि हेत को बंधन खोलि सकै ऐसो को हितकारी ॥१३७॥ शब्दार्थ—लाल=पुत्र । सलोनो=सुन्दर । अनियारी=विलक्षण । जोहन=दृष्टि । विधि=ब्रह्मा । हेत=प्रेम । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के विषय मे पूछती है कि हे सखि ! यह सुन्दर पुत्र किसका है जिसकी बडी बडी विलक्षण आँखे है । यह विशाल वंक दृष्टि रूपी भारी तीक्ष्ण बाणो से हृदय को बेधता है । रसखान कहते हैं कि चाहे कोई करोडो सुखकारी उपाय करे, पर इन बाणो की चोट को नही संभाल सकता । यदि भाग्य मे ब्रह्मा ने प्रेम का बंधन लिख दिया हो तो ऐसा कोई भी हितकारी नही है जो इस बंधन को खोल सके ।
४. दान-लीला (राधा-कृष्ण दान प्रसंग व कवित्त)
२४४ रसखान-ग्रन्थावली विशेष—अंतिम पंक्ति मे विवशता के माध्यम से प्रेम की दृढ़ता का वर्णन है। नेत्रोपालम्भ सवैया अली पगे रँगे जे रंग सावरे मो पै न आवत लालची नैना । धावत है उतही जित मोहन रोके एकै नहि घूँघट ऐना ॥ काननि कौ कल नाहि परै सखी प्रेम सो भीजे सुने बिन बैना । रसखानि भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यौ हूँ छूटै ना ॥१३८॥ शब्दार्थ—आली = सखी । रंग = प्रेम । ऐना = घर । काननि कौ = कानो को । कल = चैन । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरे ये लालची नेत्र कृष्ण के प्रेम मे इस प्रकार बन्दी हो गये है कि अब ये मेरे वश मे नही रहे । ये जिस ओर भी कृष्ण को देखते हैं, उसी ओर दौड़ने लगते हैं और घूँघट के घर मे भी नही रुकते, अर्थात् चाहे जितना आवरण इनके ऊपर डाला जाये, ये उस आवरण को भेद कर भी कृष्ण की ओर दौड़ते हैं। हे सखि ! प्रेम से भीगे हुए वचनों को सुने बिना इन कानो को चैन नही मिलता, अर्थात् ये कान प्रिय की मधुर बातो को सुनने के लिए सदैव आकुल रहते हैं। रसखान कहते हैं कि मेरी ये आँखें शहद की मक्खियाँ बन गई हैं, अत अब प्रेम का वन्धन किस प्रकार छूट सकता है ? कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार शहद की मक्खियाँ अपने ही बनाये हुए शहद मे बंदी हो जाती हैं, उसी प्रकार मेरे नेत्र अपने द्वारा ही उत्पन्न किये गये प्रेम मे बन्दी बन गये हैं । विशेष—१. अंतिम पंक्ति मे रूपक अलंकार है । २ आँखों को मधु मक्खी बताना बहुत ही भावपूर्ण है । सवैया श्री वृषभान की छान धुजा अटकी लरकान ते आन लई री । वा रसखान के पानि की जानि छुडावति राधिका प्रेममई री । जीवन मूरि सी नेज लिये इनहूँ चितयौ उनहूँ चितई री । लाल लली दृग जोरत ही सुरझानि गुडी उरझाय दई री ॥१३६॥
व्याख्या भाग २४५ शब्दार्थ--छान = छत । धुजा = ध्वजा । पानि = हाथ । जीवन-मूरि = सजीवनी बूटी के समान । अर्थ—राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वृषभानु की छत पर जो ध्वज (पतग) आकर अटकी थी, वह अन्य लड़को ने आकर ले ली । उस पतग को आनन्द-सागर कृष्ण के हाथो की जानकर प्रेममयी राधा उसे उनसे छुड़ाने लगी । इसी समय राधा ने सजीवनी बूटी के समान जीवनदायक तथा बरछी के समान चोट करने वाली दृष्टि से कृष्ण की ओर देखा, तथा कृष्ण ने राधा की ओर देखा । राधा और कृष्ण की आँखे मिलते ही वह सुलझने वाली पतग की डोर और भी अधिक उलझ गई । विशेष—१. 'जीवन मूरि सी नेज लिये' मे विरोधाभास अलकार है । २ गुडी के माध्यम से प्रेमाभिव्यजना की परिपाटी रीतिकाल मे प्रचलित थी । उदाहरण के लिए बिहारी का यह दोहा प्रस्तुत है— ‘उडति गुडी लखि ललन की ऑगना अँगना माँह । बौरी लौ दौरी फिरति छुवति छबीली छाँह ॥’ ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—१. हौ झुकि के जु लगी सुरझावन, पूँछत ठोडी गहै है तू कोरी । ब्रह्म कहै उरझै सुरझै नहि, छूटत गाँठ न टूटत डोरी ॥’ —ब्रह्म कवि २. ‘बिसरी सिगरी सुधि ता छन तैं, कछु ऐसिऐ डीठि की फाँस घली । कढि केसन के सुरझाइवै कौ, मनमोहन सो उरझाय चली ॥’ —द्विजदेव सवैया आई सबै ब्रज-गोप लली ठिठकी ह्वै गली जमुना-जल न्हाने । औचक आइ मिले रसखानि बजावत वेनु सुनावत ताने ॥ हा हा करी सिसकी सिगरी मति मैन हरी हियरा हुलसाने । छू मै दिवानी अमानी चकोर सो ओर सो दोऊ चलै दृग बाने ॥१४०॥
२४६ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—ब्रज-गोपलली = ब्रज की वनिताएँ । औचक = अचानक । मैन = कामदेव । अयानी = परिणाम पर विचार न करने वाली । बाने = बाप । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि जब सारी ब्रज-वनिताएँ यमुना मे स्नान करने के लिए आई तो गली मे आकर ठिठक गई, क्योकि उन्हे अचानक ही आनन्द-सागर कृष्ण मिल गया जो वंशी बजाकर मधुर तानें सुनाने लगा । उसे देखकर सब हा-हा करने लगी और सिसकने लगी । उनकी बुद्धि कामदेव ने हरण कर ली और वे अपने मन मे प्रसन्न होने लगी । वे कृष्ण-प्रेम मे चकोर की भाँति ऐसी पागल होकर घूमने लगी कि उसके परि- णाम पर भी उन्होने विचार नही किया । दोनो ओर से नयन-बाण चलने लगे । विशेष—उपमा अलकार । कवित्त छूट्यौ गृह काज लोक लाज मन मोहिनी को, भूल्यौ मन मोहन को मुरली बजाइवौ । देखो रसखान दिन द्वै मे बात फैलि जै है, सजनी कहाँ लौ चन्द हाथन दुराइवौ । कालि ही कलिन्दी कूल चितयौ अञानक ही, दोउन को दोऊ ओर मूरि मुसिकाइवौ । दोऊ परैं पैया दोऊ लेत है बलैया, इन्हे, भूल गई गैया उन्हे गागर उठाइवौ ॥१४१॥ शब्दार्थ—कहाँ लौ चन्द हाथन दुराइवौ = चन्द्रमा को कहाँ तक हाथो से छिपाया जा सकता है। कलिन्दी-कूल = यमुना का किनारा । पैया = पैर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण-मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब राधा और कृष्ण का मिलन हुआ तो राधा गृह-कार्यो को तथा लोक-लज्जा को भूल गई । कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाना भूल गए । उनके इस मिलन की बात कुछ ही समय मे सब जगह फैल जायेगी, क्योकि चन्द्रमा को कहाँ तक और कब तक हाथो से छिपाया जा सकता है। कल ही यमुना के तट पर अकस्मात् दोनो ने एक दूसरे को देखा, दोनो एक दूसरे की ओर मुड़कर मुस्कुराये । दोनो एक दूसरे के पैर पडे और दोनो ही आपस मे बलैया लेने लगे । इस प्रेम-व्यापार मे दोनो ही इतने तन्मय हुए कि
व्याख्या भाग २४७ कृष्ण अपनी गायो को चराना भूल गए और राधा अपनी जल से भरी हुई गागर को उठाना भूल गई । विशेष- लोकोक्ति अलंकार । सम्पादित - 'रसखान-ग्रंथावली' मे नही है । तुलना - 'बसी को बजैबौ नट नागर को भूल गयो, नागरि को भूल गयो गागर को भरिबौ ।' -काशिराम पाठान्तर- 'ए रही आजु काल्हि सब लोक लाज त्यागि दोऊ, सीखे है सबै विधि सनेह सरसाइबो । यह रसखानि दिना द्वै मै बात फैलि जैहै, कहाँ लौ सयानी चन्दा हाथन छिपाइबो । आजु हौ निहार्यौ बीर निपट कलिन्दी-तीर, दोउन को दोउन सो मुरि मुस्काइबो । दोउ परै पैयाँ दोऊ लेत है बलैया, उन्है भूलि गई गैया इन्हें गागर उचाइबो ।' सवैया मजु मनोहर मूरि लखै तबही सबही पतही तज दीनी । प्राण पखेरू परे तलफै वह रूप के जाल मैं आस-अधीनी ॥ आँख सो आँख लडी जबही तब सो ये रहै अँसुवा रंग भीनी । या रसखानि अधीन भई सब गोप-लली तजि लाज नवीनी ॥१४२॥ शब्दार्थ - मजु = सुन्दर । मूरि = मूल । पतही = प्रतिष्ठा को, पत्तो को । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप-प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उस कृष्ण-रूपी सुन्दर और मनोहर मूल को देखकर सभी गोपियो ने अपनी प्रतिष्ठा-रूपी पत्तो को छोड़ दिया है, इसी कारण उनके प्राण-रूपी पक्षी रूप-रूपी जाल मे पड़े हुए तडप रहे है और जीवन की आशा उसके अधीन हो गई है; अर्थात् गोपियों को जिलाना और मारना कृष्ण के हाथ मे आ गया है । जब से कृष्ण की आँखों से गोपियो की आँखे मिली है, तभी से ये आँखे निरन्तर आँसुओ से भरी रहती है । सारी युवती गोप-कन्याये अपनी लज्जा को छोडकर आनन्द-सागर कृष्ण के अधीन हो गई है ।
२४८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया नन्द को नन्दन है दुखकन्दन प्रेम के फन्दन बाँधि लई हों । एक दिना ब्रजराज के मन्दिर मेरी अली इक वार गई हौं ॥ हेर्यौ लला लचकाइ कै मोतन जोहन की चकडोर भई हौं । दौरी फिरौ दृग डोरनि मैं हिय मैं अनुराग की वेलि बई हों ॥१४३॥ शब्दार्थ —दुखकन्दन = दुख देने वाला । जोहन की = देखने की । चकडोर = चकई नाम के खिलौने की डोर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रेम के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण बहुत दुख देने वाले है। उन्होने मुझे भी अपने प्रेम के वन्धन मे बाँध लिया है । एक दिन मैं कृष्ण के मन्दिर मे गई थी, और उस दिन प्रथम वार ही मै वहाँ गई थी कि कृष्ण ने लचका कर मेरी ओर देखा, मै तो उनकी दृष्टि के लिए चकर्ड की डोर ही वन गई, अर्थात् जिस प्रकार चकर्ड पर डोर बार-बार लिपट जाती है, उसी प्रकार वे मुझे बार-बार देखते रहे । तभी से मैं आँख की चकडोर से चकर्ड की भाँति दौडी फिर रही हू और मेरे हृदय मे कृष्ण के प्रति प्रेम की वेल फूट निकली है । विशेष – १ 'दुखकन्दन' का लाक्षणिक प्रयोग है। २ 'हेर्यौ लला लचकाइ कै मोतन, मे शारीरिक प्रेम की ओर संकेत है। ३. रूपक अलकार । सवैया तीरथ भीर मे भूलि परी अली छूट गई नेकु धाय की बाँही । हौ भटकी भटकी निकसी सु कुटुम्ब जसोमति की जिंहि घाँही । देखत ही रसखान मनौ सु लग्यौ ही रह्यौ कब को हियराँही । भाँति अनेकन भूलो हुती उहि द्यौस की भूलनि भूलत नाँही ॥१४४॥ शब्दार्थ—अली = सखी । धाय = धात्री, पालन-पोषण करने वाली । घाँही = स्थान, घर । हियराँही = हृदय मे । द्यौस = दिन । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण-मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं अकस्मात् भूलकर तीर्थ-यात्रियो की भीड मे जा घुसी और धात्री की बाँह मेरे हाथ से छूट गई । मै भटकती हुई उस ओर जा निकली, जहाँ यशोदा जी का घर (डेरा) था । मुझे देखते ही आनन्द-सागर कृष्ण मेरे हृदय से इस प्रकार लग गया जैसे वह न जाने कब का इस हृदय से लगा हुआ
व्याख्या भाग २४६ था । मैं अनेक प्रकार की भूल कर चुकी थी, जिन्हें मैं भूल गई, पर उस दिन जो भूल कृष्ण-मिलन का कारण हुई थी, वह भुलाए नही भूली जाती । विशेष-यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नहीं है । सवैया समुझै न कछू अजहूँ हरि सो ब्रज नैन नचाइ नचाइ हँसै । नित सास की सीरी उसासनि सौं दिन ही दिन माइ की कांति नसै । चहुँ ओर बवा की सौं सोर सुनै मन मेरेऊ आवति री सकसै । पै कहा करौ वा रसखानि विलोकि हियो हुलसै हुलसै हुलसै ॥१४५॥ शब्दार्थ-सोर = बदनामी । सकसै = उलझ । हुलसै = प्रसन्न होना । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अन्य गोपी के आकर्षण को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखी ! वह आज भी कुछ नही समझती, वरन् कृष्ण को देखकर ब्रज में आँखे नचा-नचाकर हँसने लगती है । नित्य सासु की ठंडी साँसो से उस गोपी की कांति दिन-दिन क्षीण होती जा रही है । मैं बाबा की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि चारो ओर उसकी बदनामी को सुनकर मेरे मन मे उलझन पैदा हो गई है । लेकिन क्या करूँ, उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर उसका हृदय बार-बार हुलसने लगता है, अर्थात् वह अपनी बदनामी की चिन्ता न करके बराबर कृष्ण मे अनुरक्त है । विशेष-अन्तिम पंक्ति मे 'हुलसै' शब्द की आवृत्ति भावो मे तथा प्रभाव मे अभिवृद्धि का कारण है । सवैया मारग रोकि रह्यौ रसखानि के कान परी झनकार नई है । लोग चितै चित दै चितए नख तै मन माहि निहाल भई है । ठोढी उठाइ चितै मुसकाइ मिलाइ कै नैन लगाइ लई है । जो बिछिया बजनी सजनी हम मोल लई पुनि बेचि दई है ॥१४६॥ शब्दार्थ-नख ते = नख से शिख तक, पूर्ण रूप से । निहाल = प्रसन्न । बिछिया = पैर का एक आभूषण । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने राधा का मार्ग रोका और उसके कानो मे एक नवीन झकार पडी ।
२५० रसखान-ग्रन्थावली उस झकार को लोगो ने चित्तपूर्वक सुना और राधा भी उसकी झंकार सुनकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हो गई। कृष्ण ने उसकी ठोढी उठाकर देखा और उसकी ओर मुस्कराये तथा उन दोनो के नेत्रो से नेत्र मिले। हे सजनी ! जो बजने वाली विछिया हमने खरीदी थी, अर्थात् हमारी क्रीतदासी थी, उसीने हमे कृष्ण के हाथ बेच डाला। अर्थात् उसी की ध्वनि सुनकर कृष्ण हमारे पास आते रहे और हमारा प्रेम अगाढ़ होता रहा। सवैया जमुना-तट वीर गई जब तें तब तें जग के मन माँझ तही। ब्रज मोहन गोहन लागि भटू हौं लटू भई लूट सी लाख लही। रसखान लला ललचाय रहे गति अपनी हौ कहि कासो कहौ। जिय आवत यो अवतों सद भाँति निसक ह्वै अंक लगाय रहौ ॥१४७॥ शब्दार्थ = वीर = सखी। तही = जलती हूँ, ईर्ष्या का कारण बन गई हूँ। गोहन = साथ। भटू = सखी। लटू भई = मुग्ध हो गई। लूट सी लाख लही = लाखो की सम्पत्ति (प्रेम-सम्पदा) लूट मे प्राप्त कर ली। अंक = हृदय। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मै यमुना-तट पर गई हूँ और वहाँ कृष्ण से मिलन हुआ है, तब से सारा ससार मुझ से ईर्ष्या करने लगा है। हे सखि ! मैं कृष्ण के साथ रहकर इतनी मुग्ध हो गई कि लाखो की प्रेम-सम्पत्ति मुझे लूट मे ही मिल गई। तब से आनन्द-सागर कृष्ण मुझे अपनी ओर इतना अधिक आकृष्ट कर रहे है कि मै अपनी इस अवस्था का वर्णन किसी से भी नही कर सकती। अब तो मेरे मन मे यही आता है कि मै ससार के और समाज के सारे बन्धनो को छोडकर तथा निर्भय होकर कृष्ण के हृदय से लगी रहूँ। विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है। सवैया औचक दृष्टि परे कहुँ कान्ह जू तासो कहै ननदी अनुरागी। सो सुनि सास रही मुख मोहि जिठानी फिरै जिय मैं रिस पागी। नीके निहारि कै देखे न आँखिन हौं कवहूँ भरि नैन न जागी। मो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी ॥१४८॥
व्याख्या भाग २५१ शब्दार्थ - औचक = अचानक । अनुरागी = प्रेमिका । रिस = क्रोध । भरि नैन न जागी = आँखो मे छवि भरकर जागने का अवसर भी नही मिला । अक = हृदय । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! अचानक ही कृष्ण मुझे दिखाई पड गये और मै उन्हे देखने लगी । इसी पर ननद ने मेरी यह बदनामी फैला दी कि मै कृष्ण मे अनुरक्त हूँ और उनकी प्रेमिका हूँ । इस बदनामी को सुनकर सासु ने मुझ से मुँह मोड लिया है और जिठानी क्रोध मे भर कर फिर रही है । हे सखि ! तू अच्छी प्रकार से मेरी आँखों मे झाँक कर देख, तब तुझे पता चलेगा कि मै कभी भी इन आँखो मे कृष्ण के रूप की छवि भरकर नही जागी हूँ । हे सखि ! मुझे केवल यही पछतावा है कि कृष्ण-प्रेम का मुझे कलंक तो लग गया है, पर मै कभी भी उसके हृदय से नही लग पाई हूँ । विशेष - अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार । तुलना - 'लागे कलकहुँ अक लगे नहि तो सखि भूल हमारी महा है।' — हरिश्चन्द्र सवैया सास की सास नही चलिवो चलियै निसिद्यौस चलावै जिही ढग । आली चबाव लुगाइन के डर जाति नही न नदी ननदी-सग । भावती औ अनभावती भीर मै छुवै न गयौ कबहुँ अंग सो अग । घैरु करै घरुहाईं सबै रसखानि सौ मो सौ कहा कै भयो रग ॥१४६॥ शब्दार्थ - सासनही = आदेश के अनुसार । निसिद्यौस = रात-दिन । चबाव = बदनामी की चर्चा । भावती = प्रिय । अनभावती = अप्रिय । घैरु = बदनामी । घरुहाईं = बदनाम करने वाली स्त्रियाँ । रग = प्रेम । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का उल्लेख करते हुए कहती है कि यद्यपि मै सासु के आदेश के अनुसार ही चलती हूँ । वह रात-दिन जिस प्रकार चलाती है, उसी प्रकार चलती हूँ, अर्थात् हर प्रकार से प्रत्येक समय उसकी आज्ञा का पालन करती हूँ । अन्य नारियो के द्वारा बदनामी की चर्चा के डर से मै अपनी ननदी के साथ नदी के किनारे भी नही जाती । प्रिय तथा अप्रिय भीड मे भी मेरा शरीर कभी भी उसके शरीर से छुआ नही है । फिर भी बदनाम करने वाली सभी स्त्रियाँ मेरी बदनामी
२५२ रसखान-ग्रन्थावली करती है। आनन्द-सागर कृष्ण के साथ मेरा प्रेम क्या हुआ मानो एक आफत ही मैंने मोल ले ली। विशेष—इन पक्तियो मे प्रेमिका गोपी का भोलापन अकित है। सवैया घर ही घर घेरु घनो घरिही घरिहाइनि आगैं न सांस भरौं । लखि मेरियै ओर रिसाहि सबै सतराहिं जौ सौंहैं अनेक करौं । रसखानि तो काज सबै ब्रज ती रो मेर्वैरी भयी कहि कासो लरों । बिनु देखे न क्यो हूँ निमेपै लगै तेरे लेखेँ न हूँ या परेखै मरौं ॥१५०॥ शब्दार्थ—घरही घर = प्रत्येक घर मे । घेरु = बदनामी की चर्चा । घरिही = घडी भर मे ही । घरिहाइनि = बदनामी करने वानी । सौहैं = सौगन्ध । तो काज = तेरे कारण । निमेपै = पलक । परेखे = पछतावे । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से अपनी विवश स्थिति का वर्णन करती हुई कहती है कि तुम्हारे प्रेम के कारण प्रत्येक घर मे घड़ी भर मे ही मेरी बहुत अधिक बदनामी फैल गई है जिसके कारण मै बदनाम करने वाली स्त्रियो के सामने साँस भी नही भर सकती । यदि मै अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अनेक सौगन्ध खाती हूँ तो वे भृकुटी चढाकर तथा मेरी ओर देखकर क्रोध करती है । हे आनन्द-सागर कृष्ण । तेरे कारण मारा ब्रज मेरा शत्रु बन गया है । तुम्ही बताओ अव मै किस-किस से लडती फिरूँ । तुम्हारे देखे विना और तुम्हे देखते समय मेरी पलक नही लगती, अर्थात् न तो मुझे तुम्हारे वियोग मे चैन है और न तुम्हारे मिलन मे । इसी पछतावे मे मैं मर रही हूँ । विशेष—१. प्रेमजन्य विवश स्थिति का मार्मिक वर्णन है । २ प्रथम पक्ति मे अनुप्रास और यमक का सुन्दर प्रयोग है । ३. अन्तिम पक्ति मे विरोधाभास अलकार ने भावो के प्रभाव को द्विगुणित कर दिया है । तुलना—१. 'देखे निरमोही के विसे मे 'सेख' तोहि पिय, लेखे नाहि तेरे सु परेखे माहि मरिये ।' —शेख आलम २. 'सबही सही नाहि कहौ कछु पै तुव लेखे नही या परेखे मरौ ।' —हरिश्चन्द्र
व्याख्या भाग २५२ दोहा स्याम सघन घन घेरि कै, रस बरस्र्यौ रसखानि । भई दिवानी पानि करि, प्रेम-मद्य मन मानि ॥१५१॥ शब्दार्थ—स्याम = काला, कृष्ण । सघन = गहन, प्रेमपूर्ण । रस = जल, आनन्द । दिमानी = दिवानी । पानि करि = पीकर । प्रेम-मद्य = प्रेम रूपी शराब । मन मानि = छिककर, पूर्ण तृप्त होकर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! गहन बादल रूपी प्रेमपूर्ण श्याम कृष्ण ने मेरे ऊपर जल रूपी आनन्द की वर्षा की और मैंने छिककर प्रेम रूपी शराब पी । उस शराब को पीकर मै कृष्ण दिवानी हो गई । भाव यह है कि मै कृष्ण के प्रेम मे मदोन्मत्त बन गई हूँ । विशेष—श्लेष और रूपक अलंकार । सवैया कोउ रिझावन कौ रसखानि कहै मुकतानि सो माँग भरौगी । कोऊ कहै गहनो अग-अग दुकूल सुगन्ध पर्यौ पहिरौगी ॥ तूँ न कहै न कहै तो कहौ हौ कहू न कहौ तेरे पाँय परौगी । देखहि तूँ यह फूल की माल जसोमति-लाल निहाल करौगी ॥१५२॥ शब्दार्थ — मुकतानि सो = मोतियो से । दुकूल = वस्त्र । निहाल = प्रसन्न । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि । आनन्द- सागर कृष्ण को रिझाने के लिए कोई गोपी तो यह कहती है कि मै अपनी भौंहो मे मोतियो को पिरोऊँगी, कोई कहती है कि मै अपने अग-अग पर आभूषण पहनूँगी और कोई कहती है कि मै अपने वस्त्रों को सुन्दर एव मादक गन्ध से परिपूर्ण कर लूँगी । यदि तू किसी से मेरी बात न बताये और इस बात का वचन दे तो मै तुझे बताये देती हूँ कि मै तो इस फूल-माला से ही यशोदा-पुत्र कृष्ण को प्रसन्न कर लूँगी । कहने का भाव यह है कि कृष्ण को फूल-माला ही सर्वोत्तम प्रिय है, किन्तु इस बात को अन्य गोपियाँ नही जानती । विशेष—तृतीय पंक्ति मे शब्द-योजना अनुपम है ।
२५४ रसखान-ग्रन्थावली सवैया प्यारी पै जाइ कितौ परि पाइ पची समझाइ सखी की सौ बैना। वारक नन्दकिशोर की ओर कह्यौ दृग छोर की कोर करै ना। ह्वै निकस्यौ रसखान कहूँ उत डीठ पर्यौ पियरो उपरैना। जीव सो पाय गई पचिवाय कियौ रुचि नेह गये लचि नैना ॥१५३॥ शब्दार्थ—कितौ = कितना ही। परि पाउ = पैरो मे पडकर । पची समझाई = समझाकर थक गई। सौ = सौगन्ध। वारक = एक वार। डीठि पर्यो = दिखाई दिया। पियरो = पीला। उपरैना = वस्त्र। पचिवाय = वात रोग शान्त हुआ। गये लचि नैना = नेत्र लज्जा के कारण झुक गये। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति आकृष्ट किसी अन्य गोपी की प्रेम-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मैंने अपनी उस प्रिय सखी के पास जाकर और उसके पैरो में पडकर यह बात इतनी वार कही कि मैं समझाते-समझाते थक गई। मैंने उससे कहा कि एक बार भी तुम कृष्ण की ओर अपनी आँखों की पलकें न उठाना। परन्तु उसकी विवशता यह है कि जब भी कृष्ण बाहर निकलते हैं और उनके पीले वस्त्र पर उसकी दृष्टि पड़ती है, तभी उसमे नवीन जीवन का-सा संचार होता हो, उसका वात रोग शान्त हो जाता है वह कृष्ण के प्रति मनोहर प्रेम का प्रदर्शन करने लगती है और इसी कारण लज्जा से उसके नेत्र झुक जाते हैं। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया सखियां मनुहारि कै हारि रही भृकुटी को न छोर लली नचयौ। चहुँधा घन घोर नयो उनयौ नभ नायक ओर चितै चितयौ। विकि आप गई हिय मोल लियौ रसखान हितू न हियो रिझयौ। सिगरो दुख तीछन कोटि कटाछन काटि कै सौतिन बाँटि दियौ ॥१५४॥ शब्दार्थ—मनुहारि कै = अनुनय-विनय करके। नचयौ = नीचा किया। उनयौ = घिर आया। नायक = श्रीकृष्ण से तात्पर्य है। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य मानवती गोपी का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सारी सखियाँ उस मानवती गोपी की