रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० रसखान-ग्रन्थावली सवैया तुम चाहो सो कहौ हम तौ नन्दवारे के संग ठईं सो ठईं । तुम ही कुलवौने प्रवीने सबै हम ही कुछ छाडि गईं सो गईं । रसखान यो प्रीत की रीत नई सु कलंक की मोटैं लई सो लईं । यह गाव के वासी हँसै सो हँसै हम स्याम की दासी भई सो भईं ॥१३१॥ शब्दार्थ—नन्दवारे के संग=कृष्ण के साथ । ठईं सो ठईं =दृढ़ सकल्प करके मिल चुकी है । कुलवीने=कुलवान । मोटैं=गठरियाँ । अर्थ—गोपिया किसी अन्य गोपी से जो उन्हे कृष्ण प्रेम से विरत करना चाहती है, कहती है कि तुम जो चाहो हम को कह लो , लेकिन हम तो दृढ़ संकल्प करके कृष्ण के साथ मिल चुकी है, अर्थात् उससे प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर चुकी हैं । तुम ही सब प्रकार से कुलवती और प्रवीण सही, पर हमने तो कुल की मर्यादा को तिलाजलि दे दी है । हमारे प्रेम की यह रीति नही है, हमे जो भी बदनामी की गठरिया मिली हैं, उन्हे हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया है । अब चाहे हमारे ग्राम के निवासी हम पर कितना ही हँसें, पर हम तो कृष्ण की दासी बन ही चुकी हैं । विशेष—१. गोपियो के अनन्य प्रेम की सुन्दर व्यंजना है । २. वीप्सा अलकार का प्रयोग प्रभावोत्पादक है । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है । सवैया मोर पखा धरे चारिक चारु विराजत कोटि अमेठनि फैंटो । गुंज छरा रसखान विसाल अनग लजावत अंग करैंटो । ऊँचे अटा चढि एड़ी ऊँचाइ हितौ हुलसाय कैं हौंस लपेटो । हौ कब के लखि हौं भरि आँखिन आवत गोधन धूरि घुरैंटो ।१३२। शब्दार्थ—चारिक=चार-एक अर्थात् थोडे-से । कोटि अमेठनि फैंटो = करोड़ो पेचो से युक्त पगड़ी । गुंजछरा=गुंज की माला, एक आभूषण विशेष । अनग=कामदेव । अंग करैंटो=स्याम शरीर । हौंस=अभिलाषा । भरि आँखिन=आँखो मे भरकर । गोधन धूर धुरैंटो=गोओ की धूल से भूसरित । अर्थ—शाम को घर लौटते हुए कृष्ण की शोभा का वर्णन कोई गोपी-