रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २४१ अपनी सखी से करती हुई कह रही है कि हे सखि ! वह सिर पर थोडे-से मोर-पंखो का मुकुट धारण किए हुए है। उनकी करोडो पेचो से युक्त पगडी अत्यन्त शोभायमान हो रही है। उनके हृदय पर पडी हुई विशाल गुंजमाला तथा श्याम शरीर कामदेव को भी लज्जित करता है। मैने उन्हे ऊँची अटारी पर चढ कर तथा उचक कर हृदय मे हुलस कर अनेक अभि- लाषाओ से युक्त होकर देखा है। मै गौओ की धूल से धूसरित होकर आते हुए कृष्ण को बहुत देर से आँखे भरकर देख रही हूँ। विशेष—१ तृतीय पंक्ति मे औत्सुक्य भावो की सुन्दर योजना है। २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र सम्पादित 'रसखान ग्रंथावली' मे नही है। सवैया कुंजनि कुंजनि गुंज के पुंजनि मजु लतानि सौ माल बनैबो। मालती मल्लिका कुंद सौ गूंदि हरा हरि के हियरा पहिरैबो॥ आली कबै इन भावने भाइन आपुन रीझि कै प्यारे रिझैवो। माइ भकै हरि हाँकरिबो रसखानि तकै फिरि कै मुसकैबो॥१३३॥ शब्दार्थ—पुंजनि=समूह । हरा=हार । आली=सखी । भावते भाइन=प्रिय भाव। हाकरिबौ=पुकारना। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि कुंज-कुंज के गुंजो के समूहो को इकट्ठा करके उनकी सुन्दर लताओ से माला बनाऊँगी। मालती मल्लिका और कुंदो से हार गूँथकर कृष्ण के हृदय पर पहनाऊँगी. हे सखि ! न जाने कब इन प्रिय भावो से स्वय ही रीझकर अपने प्रिय कृष्ण को स्थिर पाऊँगी। मै यथाशक्ति उन्हे पुका- रूंगी. वे पीछे की ओर देखेगे और तब मै उनकी ओर मुडकर पुरस्कार दूँगी। पाठान्तर—इस सवैया की चौथी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'पाइ लुकै दुरि हाँ करिबो रसखान तकै फिरि कै मुसकैवो।' सवैया सब धीरज क्यो न धरौ सजनी पिय तो तुम सो अनुरागेइगौ। जब जोग संजोग को आन बनै तब जोग विजोग को मानेइगौ।