रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ रसखान-ग्रन्थावली निसचै निरधार धरौ जिय मे रसखान सर्व रस पावेडगी । जिनके मन सो मन लागि रहे तिनके तन माँ तन लागेइगो ॥१३४॥ शब्दार्थ — अनुरागेइगी = अवश्य प्रेम करेगा । निसचै = निश्चय । रस = आनन्द । अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि ! तू सब प्रकार से अपने मन मे धैर्य धारण कर, क्योंकि एक न एक दिन प्रियतम कृष्ण तुमसे अवश्य प्रेम करेगा । जब मिलने का समय आयेगा तो वियोग की घडियाँ नष्ट हो जाएँगी । तुम निश्चय ही अपने हृदय मे धैर्य धारण करो, क्योकि तुम आनन्द-सागर कृष्ण से अवश्य आनंद प्राप्त करोगी । जिसके मन मे तेरा मन लगा हुआ है, उसके शरीर मे भी तेरे शरीर का मिलन होगा । विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें । उनही की सुनै न औ बैन त्यौं सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें ॥ उनही सँग डोलन मैं रसखान सबै सुखसिन्धु अघानी रहें । उनही बिन ज्यों जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी असुवानी रहें ॥१३५॥ शब्दार्थ — सनेहन = प्रेम । सानी रहें = परिपूर्ण रहती है । अघानी = तृप्त । अर्थ — अपनी प्रेमावस्था का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! मेरा मन उसी कृष्ण के प्रेम से परिपूर्ण रहता है, मैं उन्ही के प्रेम मे पागल बनी हुई हूँ । मेरे कान केवल उन्ही की बातो को सुनते हैं, और किसी प्रकार की वाणी को नही सुनते । उनकी चितवन ही मुझे अनेक प्रकार से आनंद प्रदान करती है । मैं उन्ही के साथ रहने मे इतना सुख-सागर प्राप्त कर लेती हू कि पूर्णतया तृप्त हो जाती हूँ । उनके बिना मेरी आँखे आँसुओ मे डूबकर इस प्रकार तडपती रहती है जिस प्रकार पानी के बिना मछली । विशेष — १. आनन्द-भाव के प्रेम का वर्णन है । २. उपमा अलकार ।