रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २४३ प्रेम-बन्धन सवैया चंदन खोर पै बिन्दु लगाय कै कु जन ते निकस्यौ मुसकातो । राजत है बनमाल गरे अरु मोरपखा सिर पै फहरातो । मै जब ते रसखान बिलोकति ही कछु और न मोहि सुहातो । प्रीति की रीति मे लाज कहा सखि है सब सो बडनेह को नातो ॥१३६॥ शब्दार्थ—खोर=तिलक । नेह=प्रेम । बड=बडा, महत्वपूर्ण । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! चन्दन के तिलक पर बिन्दी लगाकर कृष्ण मुस्कराता हुआ कुंजो से निकला । उसके गले मे बनमाला सुशोभित थी और सिर पर मोर-पखो का मुकुट फहरा रहा था । मैने जब से आनन्द-सागर कृष्ण की इस शोभा को देखा है तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता । हे सखि ! प्रेम की रीति मे लज्जा त्याज्य है, क्योकि प्रेम का सम्बन्ध सबसे बड़ा सम्बन्ध है । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रथावली' मे नही है । सवैया कौन को लाल सलोनी सखी वह जाकी बडी अँखियाँ अनियारी । जोहन बक बिसाल के बाननि बेधत है घट तीछन भारी ॥ रसखानि सम्हारि परै नहि चोट सु कोटि उपाय करे सुखकारी । भाल लिख्यौ विधि हेत को बंधन खोलि सकै ऐसो को हितकारी ॥१३७॥ शब्दार्थ—लाल=पुत्र । सलोनो=सुन्दर । अनियारी=विलक्षण । जोहन=दृष्टि । विधि=ब्रह्मा । हेत=प्रेम । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के विषय मे पूछती है कि हे सखि ! यह सुन्दर पुत्र किसका है जिसकी बडी बडी विलक्षण आँखे है । यह विशाल वंक दृष्टि रूपी भारी तीक्ष्ण बाणो से हृदय को बेधता है । रसखान कहते हैं कि चाहे कोई करोडो सुखकारी उपाय करे, पर इन बाणो की चोट को नही संभाल सकता । यदि भाग्य मे ब्रह्मा ने प्रेम का बंधन लिख दिया हो तो ऐसा कोई भी हितकारी नही है जो इस बंधन को खोल सके ।