रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ रसखान-ग्रन्थावली विशेष—अंतिम पंक्ति मे विवशता के माध्यम से प्रेम की दृढ़ता का वर्णन है। नेत्रोपालम्भ सवैया अली पगे रँगे जे रंग सावरे मो पै न आवत लालची नैना । धावत है उतही जित मोहन रोके एकै नहि घूँघट ऐना ॥ काननि कौ कल नाहि परै सखी प्रेम सो भीजे सुने बिन बैना । रसखानि भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यौ हूँ छूटै ना ॥१३८॥ शब्दार्थ—आली = सखी । रंग = प्रेम । ऐना = घर । काननि कौ = कानो को । कल = चैन । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरे ये लालची नेत्र कृष्ण के प्रेम मे इस प्रकार बन्दी हो गये है कि अब ये मेरे वश मे नही रहे । ये जिस ओर भी कृष्ण को देखते हैं, उसी ओर दौड़ने लगते हैं और घूँघट के घर मे भी नही रुकते, अर्थात् चाहे जितना आवरण इनके ऊपर डाला जाये, ये उस आवरण को भेद कर भी कृष्ण की ओर दौड़ते हैं। हे सखि ! प्रेम से भीगे हुए वचनों को सुने बिना इन कानो को चैन नही मिलता, अर्थात् ये कान प्रिय की मधुर बातो को सुनने के लिए सदैव आकुल रहते हैं। रसखान कहते हैं कि मेरी ये आँखें शहद की मक्खियाँ बन गई हैं, अत अब प्रेम का वन्धन किस प्रकार छूट सकता है ? कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार शहद की मक्खियाँ अपने ही बनाये हुए शहद मे बंदी हो जाती हैं, उसी प्रकार मेरे नेत्र अपने द्वारा ही उत्पन्न किये गये प्रेम मे बन्दी बन गये हैं । विशेष—१. अंतिम पंक्ति मे रूपक अलंकार है । २ आँखों को मधु मक्खी बताना बहुत ही भावपूर्ण है । सवैया श्री वृषभान की छान धुजा अटकी लरकान ते आन लई री । वा रसखान के पानि की जानि छुडावति राधिका प्रेममई री । जीवन मूरि सी नेज लिये इनहूँ चितयौ उनहूँ चितई री । लाल लली दृग जोरत ही सुरझानि गुडी उरझाय दई री ॥१३६॥