रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २४५ शब्दार्थ--छान = छत । धुजा = ध्वजा । पानि = हाथ । जीवन-मूरि = सजीवनी बूटी के समान । अर्थ—राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! वृषभानु की छत पर जो ध्वज (पतग) आकर अटकी थी, वह अन्य लड़को ने आकर ले ली । उस पतग को आनन्द-सागर कृष्ण के हाथो की जानकर प्रेममयी राधा उसे उनसे छुड़ाने लगी । इसी समय राधा ने सजीवनी बूटी के समान जीवनदायक तथा बरछी के समान चोट करने वाली दृष्टि से कृष्ण की ओर देखा, तथा कृष्ण ने राधा की ओर देखा । राधा और कृष्ण की आँखे मिलते ही वह सुलझने वाली पतग की डोर और भी अधिक उलझ गई । विशेष—१. 'जीवन मूरि सी नेज लिये' मे विरोधाभास अलकार है । २ गुडी के माध्यम से प्रेमाभिव्यजना की परिपाटी रीतिकाल मे प्रचलित थी । उदाहरण के लिए बिहारी का यह दोहा प्रस्तुत है— ‘उडति गुडी लखि ललन की ऑगना अँगना माँह । बौरी लौ दौरी फिरति छुवति छबीली छाँह ॥’ ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—१. हौ झुकि के जु लगी सुरझावन, पूँछत ठोडी गहै है तू कोरी । ब्रह्म कहै उरझै सुरझै नहि, छूटत गाँठ न टूटत डोरी ॥’ —ब्रह्म कवि २. ‘बिसरी सिगरी सुधि ता छन तैं, कछु ऐसिऐ डीठि की फाँस घली । कढि केसन के सुरझाइवै कौ, मनमोहन सो उरझाय चली ॥’ —द्विजदेव सवैया आई सबै ब्रज-गोप लली ठिठकी ह्वै गली जमुना-जल न्हाने । औचक आइ मिले रसखानि बजावत वेनु सुनावत ताने ॥ हा हा करी सिसकी सिगरी मति मैन हरी हियरा हुलसाने । छू मै दिवानी अमानी चकोर सो ओर सो दोऊ चलै दृग बाने ॥१४०॥