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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२४६ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—ब्रज-गोपलली = ब्रज की वनिताएँ । औचक = अचानक । मैन = कामदेव । अयानी = परिणाम पर विचार न करने वाली । बाने = बाप । अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कह रही है कि जब सारी ब्रज-वनिताएँ यमुना मे स्नान करने के लिए आई तो गली मे आकर ठिठक गई, क्योकि उन्हे अचानक ही आनन्द-सागर कृष्ण मिल गया जो वंशी बजाकर मधुर तानें सुनाने लगा । उसे देखकर सब हा-हा करने लगी और सिसकने लगी । उनकी बुद्धि कामदेव ने हरण कर ली और वे अपने मन मे प्रसन्न होने लगी । वे कृष्ण-प्रेम मे चकोर की भाँति ऐसी पागल होकर घूमने लगी कि उसके परि- णाम पर भी उन्होने विचार नही किया । दोनो ओर से नयन-बाण चलने लगे । विशेष—उपमा अलकार । कवित्त छूट्यौ गृह काज लोक लाज मन मोहिनी को, भूल्यौ मन मोहन को मुरली बजाइवौ । देखो रसखान दिन द्वै मे बात फैलि जै है, सजनी कहाँ लौ चन्द हाथन दुराइवौ । कालि ही कलिन्दी कूल चितयौ अञानक ही, दोउन को दोऊ ओर मूरि मुसिकाइवौ । दोऊ परैं पैया दोऊ लेत है बलैया, इन्हे, भूल गई गैया उन्हे गागर उठाइवौ ॥१४१॥ शब्दार्थ—कहाँ लौ चन्द हाथन दुराइवौ = चन्द्रमा को कहाँ तक हाथो से छिपाया जा सकता है। कलिन्दी-कूल = यमुना का किनारा । पैया = पैर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण-मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब राधा और कृष्ण का मिलन हुआ तो राधा गृह-कार्यो को तथा लोक-लज्जा को भूल गई । कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाना भूल गए । उनके इस मिलन की बात कुछ ही समय मे सब जगह फैल जायेगी, क्योकि चन्द्रमा को कहाँ तक और कब तक हाथो से छिपाया जा सकता है। कल ही यमुना के तट पर अकस्मात् दोनो ने एक दूसरे को देखा, दोनो एक दूसरे की ओर मुड़कर मुस्कुराये । दोनो एक दूसरे के पैर पडे और दोनो ही आपस मे बलैया लेने लगे । इस प्रेम-व्यापार मे दोनो ही इतने तन्मय हुए कि