रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २४७ कृष्ण अपनी गायो को चराना भूल गए और राधा अपनी जल से भरी हुई गागर को उठाना भूल गई । विशेष- लोकोक्ति अलंकार । सम्पादित - 'रसखान-ग्रंथावली' मे नही है । तुलना - 'बसी को बजैबौ नट नागर को भूल गयो, नागरि को भूल गयो गागर को भरिबौ ।' -काशिराम पाठान्तर- 'ए रही आजु काल्हि सब लोक लाज त्यागि दोऊ, सीखे है सबै विधि सनेह सरसाइबो । यह रसखानि दिना द्वै मै बात फैलि जैहै, कहाँ लौ सयानी चन्दा हाथन छिपाइबो । आजु हौ निहार्यौ बीर निपट कलिन्दी-तीर, दोउन को दोउन सो मुरि मुस्काइबो । दोउ परै पैयाँ दोऊ लेत है बलैया, उन्है भूलि गई गैया इन्हें गागर उचाइबो ।' सवैया मजु मनोहर मूरि लखै तबही सबही पतही तज दीनी । प्राण पखेरू परे तलफै वह रूप के जाल मैं आस-अधीनी ॥ आँख सो आँख लडी जबही तब सो ये रहै अँसुवा रंग भीनी । या रसखानि अधीन भई सब गोप-लली तजि लाज नवीनी ॥१४२॥ शब्दार्थ - मजु = सुन्दर । मूरि = मूल । पतही = प्रतिष्ठा को, पत्तो को । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप-प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उस कृष्ण-रूपी सुन्दर और मनोहर मूल को देखकर सभी गोपियो ने अपनी प्रतिष्ठा-रूपी पत्तो को छोड़ दिया है, इसी कारण उनके प्राण-रूपी पक्षी रूप-रूपी जाल मे पड़े हुए तडप रहे है और जीवन की आशा उसके अधीन हो गई है; अर्थात् गोपियों को जिलाना और मारना कृष्ण के हाथ मे आ गया है । जब से कृष्ण की आँखों से गोपियो की आँखे मिली है, तभी से ये आँखे निरन्तर आँसुओ से भरी रहती है । सारी युवती गोप-कन्याये अपनी लज्जा को छोडकर आनन्द-सागर कृष्ण के अधीन हो गई है ।