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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२४८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया नन्द को नन्दन है दुखकन्दन प्रेम के फन्दन बाँधि लई हों । एक दिना ब्रजराज के मन्दिर मेरी अली इक वार गई हौं ॥ हेर्यौ लला लचकाइ कै मोतन जोहन की चकडोर भई हौं । दौरी फिरौ दृग डोरनि मैं हिय मैं अनुराग की वेलि बई हों ॥१४३॥ शब्दार्थ —दुखकन्दन = दुख देने वाला । जोहन की = देखने की । चकडोर = चकई नाम के खिलौने की डोर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रेम के प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण बहुत दुख देने वाले है। उन्होने मुझे भी अपने प्रेम के वन्धन मे बाँध लिया है । एक दिन मैं कृष्ण के मन्दिर मे गई थी, और उस दिन प्रथम वार ही मै वहाँ गई थी कि कृष्ण ने लचका कर मेरी ओर देखा, मै तो उनकी दृष्टि के लिए चकर्ड की डोर ही वन गई, अर्थात् जिस प्रकार चकर्ड पर डोर बार-बार लिपट जाती है, उसी प्रकार वे मुझे बार-बार देखते रहे । तभी से मैं आँख की चकडोर से चकर्ड की भाँति दौडी फिर रही हू और मेरे हृदय मे कृष्ण के प्रति प्रेम की वेल फूट निकली है । विशेष – १ 'दुखकन्दन' का लाक्षणिक प्रयोग है। २ 'हेर्यौ लला लचकाइ कै मोतन, मे शारीरिक प्रेम की ओर संकेत है। ३. रूपक अलकार । सवैया तीरथ भीर मे भूलि परी अली छूट गई नेकु धाय की बाँही । हौ भटकी भटकी निकसी सु कुटुम्ब जसोमति की जिंहि घाँही । देखत ही रसखान मनौ सु लग्यौ ही रह्यौ कब को हियराँही । भाँति अनेकन भूलो हुती उहि द्यौस की भूलनि भूलत नाँही ॥१४४॥ शब्दार्थ—अली = सखी । धाय = धात्री, पालन-पोषण करने वाली । घाँही = स्थान, घर । हियराँही = हृदय मे । द्यौस = दिन । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण-मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं अकस्मात् भूलकर तीर्थ-यात्रियो की भीड मे जा घुसी और धात्री की बाँह मेरे हाथ से छूट गई । मै भटकती हुई उस ओर जा निकली, जहाँ यशोदा जी का घर (डेरा) था । मुझे देखते ही आनन्द-सागर कृष्ण मेरे हृदय से इस प्रकार लग गया जैसे वह न जाने कब का इस हृदय से लगा हुआ