रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २४६ था । मैं अनेक प्रकार की भूल कर चुकी थी, जिन्हें मैं भूल गई, पर उस दिन जो भूल कृष्ण-मिलन का कारण हुई थी, वह भुलाए नही भूली जाती । विशेष-यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नहीं है । सवैया समुझै न कछू अजहूँ हरि सो ब्रज नैन नचाइ नचाइ हँसै । नित सास की सीरी उसासनि सौं दिन ही दिन माइ की कांति नसै । चहुँ ओर बवा की सौं सोर सुनै मन मेरेऊ आवति री सकसै । पै कहा करौ वा रसखानि विलोकि हियो हुलसै हुलसै हुलसै ॥१४५॥ शब्दार्थ-सोर = बदनामी । सकसै = उलझ । हुलसै = प्रसन्न होना । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अन्य गोपी के आकर्षण को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखी ! वह आज भी कुछ नही समझती, वरन् कृष्ण को देखकर ब्रज में आँखे नचा-नचाकर हँसने लगती है । नित्य सासु की ठंडी साँसो से उस गोपी की कांति दिन-दिन क्षीण होती जा रही है । मैं बाबा की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि चारो ओर उसकी बदनामी को सुनकर मेरे मन मे उलझन पैदा हो गई है । लेकिन क्या करूँ, उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर उसका हृदय बार-बार हुलसने लगता है, अर्थात् वह अपनी बदनामी की चिन्ता न करके बराबर कृष्ण मे अनुरक्त है । विशेष-अन्तिम पंक्ति मे 'हुलसै' शब्द की आवृत्ति भावो मे तथा प्रभाव मे अभिवृद्धि का कारण है । सवैया मारग रोकि रह्यौ रसखानि के कान परी झनकार नई है । लोग चितै चित दै चितए नख तै मन माहि निहाल भई है । ठोढी उठाइ चितै मुसकाइ मिलाइ कै नैन लगाइ लई है । जो बिछिया बजनी सजनी हम मोल लई पुनि बेचि दई है ॥१४६॥ शब्दार्थ-नख ते = नख से शिख तक, पूर्ण रूप से । निहाल = प्रसन्न । बिछिया = पैर का एक आभूषण । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने राधा का मार्ग रोका और उसके कानो मे एक नवीन झकार पडी ।