रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० रसखान-ग्रन्थावली उस झकार को लोगो ने चित्तपूर्वक सुना और राधा भी उसकी झंकार सुनकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हो गई। कृष्ण ने उसकी ठोढी उठाकर देखा और उसकी ओर मुस्कराये तथा उन दोनो के नेत्रो से नेत्र मिले। हे सजनी ! जो बजने वाली विछिया हमने खरीदी थी, अर्थात् हमारी क्रीतदासी थी, उसीने हमे कृष्ण के हाथ बेच डाला। अर्थात् उसी की ध्वनि सुनकर कृष्ण हमारे पास आते रहे और हमारा प्रेम अगाढ़ होता रहा। सवैया जमुना-तट वीर गई जब तें तब तें जग के मन माँझ तही। ब्रज मोहन गोहन लागि भटू हौं लटू भई लूट सी लाख लही। रसखान लला ललचाय रहे गति अपनी हौ कहि कासो कहौ। जिय आवत यो अवतों सद भाँति निसक ह्वै अंक लगाय रहौ ॥१४७॥ शब्दार्थ = वीर = सखी। तही = जलती हूँ, ईर्ष्या का कारण बन गई हूँ। गोहन = साथ। भटू = सखी। लटू भई = मुग्ध हो गई। लूट सी लाख लही = लाखो की सम्पत्ति (प्रेम-सम्पदा) लूट मे प्राप्त कर ली। अंक = हृदय। अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मै यमुना-तट पर गई हूँ और वहाँ कृष्ण से मिलन हुआ है, तब से सारा ससार मुझ से ईर्ष्या करने लगा है। हे सखि ! मैं कृष्ण के साथ रहकर इतनी मुग्ध हो गई कि लाखो की प्रेम-सम्पत्ति मुझे लूट मे ही मिल गई। तब से आनन्द-सागर कृष्ण मुझे अपनी ओर इतना अधिक आकृष्ट कर रहे है कि मै अपनी इस अवस्था का वर्णन किसी से भी नही कर सकती। अब तो मेरे मन मे यही आता है कि मै ससार के और समाज के सारे बन्धनो को छोडकर तथा निर्भय होकर कृष्ण के हृदय से लगी रहूँ। विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है। सवैया औचक दृष्टि परे कहुँ कान्ह जू तासो कहै ननदी अनुरागी। सो सुनि सास रही मुख मोहि जिठानी फिरै जिय मैं रिस पागी। नीके निहारि कै देखे न आँखिन हौं कवहूँ भरि नैन न जागी। मो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी ॥१४८॥