रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २५१ शब्दार्थ - औचक = अचानक । अनुरागी = प्रेमिका । रिस = क्रोध । भरि नैन न जागी = आँखो मे छवि भरकर जागने का अवसर भी नही मिला । अक = हृदय । अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! अचानक ही कृष्ण मुझे दिखाई पड गये और मै उन्हे देखने लगी । इसी पर ननद ने मेरी यह बदनामी फैला दी कि मै कृष्ण मे अनुरक्त हूँ और उनकी प्रेमिका हूँ । इस बदनामी को सुनकर सासु ने मुझ से मुँह मोड लिया है और जिठानी क्रोध मे भर कर फिर रही है । हे सखि ! तू अच्छी प्रकार से मेरी आँखों मे झाँक कर देख, तब तुझे पता चलेगा कि मै कभी भी इन आँखो मे कृष्ण के रूप की छवि भरकर नही जागी हूँ । हे सखि ! मुझे केवल यही पछतावा है कि कृष्ण-प्रेम का मुझे कलंक तो लग गया है, पर मै कभी भी उसके हृदय से नही लग पाई हूँ । विशेष - अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार । तुलना - 'लागे कलकहुँ अक लगे नहि तो सखि भूल हमारी महा है।' — हरिश्चन्द्र सवैया सास की सास नही चलिवो चलियै निसिद्यौस चलावै जिही ढग । आली चबाव लुगाइन के डर जाति नही न नदी ननदी-सग । भावती औ अनभावती भीर मै छुवै न गयौ कबहुँ अंग सो अग । घैरु करै घरुहाईं सबै रसखानि सौ मो सौ कहा कै भयो रग ॥१४६॥ शब्दार्थ - सासनही = आदेश के अनुसार । निसिद्यौस = रात-दिन । चबाव = बदनामी की चर्चा । भावती = प्रिय । अनभावती = अप्रिय । घैरु = बदनामी । घरुहाईं = बदनाम करने वाली स्त्रियाँ । रग = प्रेम । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का उल्लेख करते हुए कहती है कि यद्यपि मै सासु के आदेश के अनुसार ही चलती हूँ । वह रात-दिन जिस प्रकार चलाती है, उसी प्रकार चलती हूँ, अर्थात् हर प्रकार से प्रत्येक समय उसकी आज्ञा का पालन करती हूँ । अन्य नारियो के द्वारा बदनामी की चर्चा के डर से मै अपनी ननदी के साथ नदी के किनारे भी नही जाती । प्रिय तथा अप्रिय भीड मे भी मेरा शरीर कभी भी उसके शरीर से छुआ नही है । फिर भी बदनाम करने वाली सभी स्त्रियाँ मेरी बदनामी