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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२५२ रसखान-ग्रन्थावली करती है। आनन्द-सागर कृष्ण के साथ मेरा प्रेम क्या हुआ मानो एक आफत ही मैंने मोल ले ली। विशेष—इन पक्तियो मे प्रेमिका गोपी का भोलापन अकित है। सवैया घर ही घर घेरु घनो घरिही घरिहाइनि आगैं न सांस भरौं । लखि मेरियै ओर रिसाहि सबै सतराहिं जौ सौंहैं अनेक करौं । रसखानि तो काज सबै ब्रज ती रो मेर्वैरी भयी कहि कासो लरों । बिनु देखे न क्यो हूँ निमेपै लगै तेरे लेखेँ न हूँ या परेखै मरौं ॥१५०॥ शब्दार्थ—घरही घर = प्रत्येक घर मे । घेरु = बदनामी की चर्चा । घरिही = घडी भर मे ही । घरिहाइनि = बदनामी करने वानी । सौहैं = सौगन्ध । तो काज = तेरे कारण । निमेपै = पलक । परेखे = पछतावे । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से अपनी विवश स्थिति का वर्णन करती हुई कहती है कि तुम्हारे प्रेम के कारण प्रत्येक घर मे घड़ी भर मे ही मेरी बहुत अधिक बदनामी फैल गई है जिसके कारण मै बदनाम करने वाली स्त्रियो के सामने साँस भी नही भर सकती । यदि मै अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अनेक सौगन्ध खाती हूँ तो वे भृकुटी चढाकर तथा मेरी ओर देखकर क्रोध करती है । हे आनन्द-सागर कृष्ण । तेरे कारण मारा ब्रज मेरा शत्रु बन गया है । तुम्ही बताओ अव मै किस-किस से लडती फिरूँ । तुम्हारे देखे विना और तुम्हे देखते समय मेरी पलक नही लगती, अर्थात् न तो मुझे तुम्हारे वियोग मे चैन है और न तुम्हारे मिलन मे । इसी पछतावे मे मैं मर रही हूँ । विशेष—१. प्रेमजन्य विवश स्थिति का मार्मिक वर्णन है । २ प्रथम पक्ति मे अनुप्रास और यमक का सुन्दर प्रयोग है । ३. अन्तिम पक्ति मे विरोधाभास अलकार ने भावो के प्रभाव को द्विगुणित कर दिया है । तुलना—१. 'देखे निरमोही के विसे मे 'सेख' तोहि पिय, लेखे नाहि तेरे सु परेखे माहि मरिये ।' —शेख आलम २. 'सबही सही नाहि कहौ कछु पै तुव लेखे नही या परेखे मरौ ।' —हरिश्चन्द्र