रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २५२ दोहा स्याम सघन घन घेरि कै, रस बरस्र्यौ रसखानि । भई दिवानी पानि करि, प्रेम-मद्य मन मानि ॥१५१॥ शब्दार्थ—स्याम = काला, कृष्ण । सघन = गहन, प्रेमपूर्ण । रस = जल, आनन्द । दिमानी = दिवानी । पानि करि = पीकर । प्रेम-मद्य = प्रेम रूपी शराब । मन मानि = छिककर, पूर्ण तृप्त होकर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! गहन बादल रूपी प्रेमपूर्ण श्याम कृष्ण ने मेरे ऊपर जल रूपी आनन्द की वर्षा की और मैंने छिककर प्रेम रूपी शराब पी । उस शराब को पीकर मै कृष्ण दिवानी हो गई । भाव यह है कि मै कृष्ण के प्रेम मे मदोन्मत्त बन गई हूँ । विशेष—श्लेष और रूपक अलंकार । सवैया कोउ रिझावन कौ रसखानि कहै मुकतानि सो माँग भरौगी । कोऊ कहै गहनो अग-अग दुकूल सुगन्ध पर्यौ पहिरौगी ॥ तूँ न कहै न कहै तो कहौ हौ कहू न कहौ तेरे पाँय परौगी । देखहि तूँ यह फूल की माल जसोमति-लाल निहाल करौगी ॥१५२॥ शब्दार्थ — मुकतानि सो = मोतियो से । दुकूल = वस्त्र । निहाल = प्रसन्न । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि । आनन्द- सागर कृष्ण को रिझाने के लिए कोई गोपी तो यह कहती है कि मै अपनी भौंहो मे मोतियो को पिरोऊँगी, कोई कहती है कि मै अपने अग-अग पर आभूषण पहनूँगी और कोई कहती है कि मै अपने वस्त्रों को सुन्दर एव मादक गन्ध से परिपूर्ण कर लूँगी । यदि तू किसी से मेरी बात न बताये और इस बात का वचन दे तो मै तुझे बताये देती हूँ कि मै तो इस फूल-माला से ही यशोदा-पुत्र कृष्ण को प्रसन्न कर लूँगी । कहने का भाव यह है कि कृष्ण को फूल-माला ही सर्वोत्तम प्रिय है, किन्तु इस बात को अन्य गोपियाँ नही जानती । विशेष—तृतीय पंक्ति मे शब्द-योजना अनुपम है ।