रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ रसखान-ग्रन्थावली सवैया प्यारी पै जाइ कितौ परि पाइ पची समझाइ सखी की सौ बैना। वारक नन्दकिशोर की ओर कह्यौ दृग छोर की कोर करै ना। ह्वै निकस्यौ रसखान कहूँ उत डीठ पर्यौ पियरो उपरैना। जीव सो पाय गई पचिवाय कियौ रुचि नेह गये लचि नैना ॥१५३॥ शब्दार्थ—कितौ = कितना ही। परि पाउ = पैरो मे पडकर । पची समझाई = समझाकर थक गई। सौ = सौगन्ध। वारक = एक वार। डीठि पर्यो = दिखाई दिया। पियरो = पीला। उपरैना = वस्त्र। पचिवाय = वात रोग शान्त हुआ। गये लचि नैना = नेत्र लज्जा के कारण झुक गये। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति आकृष्ट किसी अन्य गोपी की प्रेम-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मैंने अपनी उस प्रिय सखी के पास जाकर और उसके पैरो में पडकर यह बात इतनी वार कही कि मैं समझाते-समझाते थक गई। मैंने उससे कहा कि एक बार भी तुम कृष्ण की ओर अपनी आँखों की पलकें न उठाना। परन्तु उसकी विवशता यह है कि जब भी कृष्ण बाहर निकलते हैं और उनके पीले वस्त्र पर उसकी दृष्टि पड़ती है, तभी उसमे नवीन जीवन का-सा संचार होता हो, उसका वात रोग शान्त हो जाता है वह कृष्ण के प्रति मनोहर प्रेम का प्रदर्शन करने लगती है और इसी कारण लज्जा से उसके नेत्र झुक जाते हैं। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया सखियां मनुहारि कै हारि रही भृकुटी को न छोर लली नचयौ। चहुँधा घन घोर नयो उनयौ नभ नायक ओर चितै चितयौ। विकि आप गई हिय मोल लियौ रसखान हितू न हियो रिझयौ। सिगरो दुख तीछन कोटि कटाछन काटि कै सौतिन बाँटि दियौ ॥१५४॥ शब्दार्थ—मनुहारि कै = अनुनय-विनय करके। नचयौ = नीचा किया। उनयौ = घिर आया। नायक = श्रीकृष्ण से तात्पर्य है। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य मानवती गोपी का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! सारी सखियाँ उस मानवती गोपी की