रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २५५ अनुनय-विनय करती हुई थक गई', पर उसके क्रोध मे, तनिक भी अन्तर नही आया। अचानक चारो ओर से आकाश मे नवीन घन घिर आया। इस उद्दीपक वातावरण के कारण उस गोपी का ध्यान कृष्ण की ओर गया। वह स्वय ही बिक गई और उसके प्रियतम कृष्ण ने उसे मोल ले लिया, अर्थात् वह पूर्णतया उसके वश मे हो गई। इस प्रकार कृष्ण ने अन्य प्रेमिकाओ के हृदय को रिझा लिया। तब उस मानवती गोपी ने अपना सारा दुख अपने तीक्ष्ण कटाक्षो के द्वारा दूर करके अपनी सौतो मे बाँट दिया; अर्थात् उसे कृष्ण के साथ देखकर अन्य सपत्नी गोपियो को दुख हुआ। विशेष— १ प्रहर्षण अलकार । २ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया खेलै अलीजन के गन मैं उत प्रीतम प्यारे सो नेह नवीनो। बैननि बोध करै इत कौ उत सैननि मोहन को मन लीनो। नैननि की चलिबी कछु जानि सखी रसखानि चितैवे कौ कीनो। जा लखि पाइ जबाइ गई चुटकी चटकाइ विदा करि दीनो ॥१५५॥ शब्दार्थ —अलीजन = सखियो का समूह । बैननि = वचनो से । चलिबी = चलना । अर्थ— कोई गोपी अपनी सखी से किसी क्रियाविदग्धा गोपी का वर्णन करती हुई कहती है कि वह सखियो के समूह मे खेल रही है, पर उस ओर प्रियतम कृष्ण के साथ उसका नवीन अनुराग हुआ था। वह वचनो से तो इस ओर का बोध करा रही थी, परन्तु सैनो से उस ओर चलने का सकेत करके कृष्ण के मन को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। हे सखि ! उसकी आँखों को चलता हुआ देखकर आनन्द-सागर कृष्ण ने उसकी ओर ध्यान दिया। कृष्ण को अपनी ओर आकर्षित देखकर उसने जँभाई ली और चुटकी बजाकर उसे विदा किया, अर्थात् सकेत से ही अभिसार-स्थल को बता दिया। विशेष— जो नायिका चातुर्य से कार्य करके अपनी इच्छा को पूर्ण करने मे—नायक को सकेत स्थल पर ले जाने मे—सफल होती है, उसे क्रियादिराघा कहते है। तुलना—१. 'कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात । भरे मौन मे कहत है नयन ही सो बात ॥'