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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२५६ रसखान-ग्रन्थावली २ 'ललन-चलनु सुनि पलनु मैं अँसुवा झलके आइ । भई लखाइ न सखिनु हूँ झूठे ही जमुहाइ ॥' —बिहारी सवैया मोहन के मन भाइ गयौ इक भाइ सो ग्वालिनै गोधन गायौ । ताको लग्यौ चट, चौहट सो दुरि औचक गात सो गात छुवायौ ॥ रसखानि लही इनि चतुरता चुपचाप रही जब लो घर आयौ । नैन नचाइ चितै मुसकाइ सु ओट ह्रै जाइ अँगूठा दिखायौ ॥१५६॥ शब्दार्थ—गोधन = गोचारण का गीत । चट = मन । औचक = अचानक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से प्रेमलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि जब ग्वालिन ने मधुर स्वर से गोचारण का गीत गाया तो वह कृष्ण को बहुत अच्छा लगा और साथ ही गाने वाली गोपी के प्रति आकृष्ट हो गये । ग्वालिन ने अचानक लज्जा के कारण अपना शरीर अपने शरीर मे छिपा लिया; अर्थात् वह लज्जा के कारण सिमट गई । रसखान कहते है कि उसने इतनी चतुरता से कार्य किया कि जब तक उसका घर नही आया तब तक तो वह चुपचाप रही और जब उसका घर आ गया तो वह आँखे नचाकर, मुस्कराकर और ओट मे होकर कृष्ण को अँगूठा दिखाकर अपने घर मे घुस गई । विशेष—अनुभावो की सुन्दर योजना है। सवैया कान परे मृदु बैन मरु करि मौन रही पल आधिक साधे । नद ववा घर को अकुलाय गई दधि लै विरहानल दाधे । पाय दुहूननि प्राननि प्रान सो लाज दबै चितवै दृग आधे । नैननि ही रसखान सनेह सही कियौ लेउ दही कहि राधे ॥१५७॥ शब्दार्थ—मरु करि = कठिनाई से । आधिक = आधा । विरहानल दाधे = विरह की आग से दग्ध होकर । दबै = भयभीत होकर । चितवै = देखना । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा के प्रेम की आकुलता का वर्णन करती हुई कहती है कि जब राधा के कान मे कृष्ण के सुन्दर शब्द पडे तो