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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २५७ वह कठिनता से आधे पल तक तो चुपचाप रही, फिर अकुलाकर और विरह की आग से दग्ध होकर नद बाबा के घर गई। वहाँ पर उसे कृष्ण मिले। वे दोनो एक-दूसरे को अपने प्राणो के समान प्यार करते थे। दोनो ने एक-दूसरे को आधी दृष्टि से देखा और फिर वे लज्जा के कारण भयभीत हो गये। इस प्रकार उन दोनो ने अपना प्रेम आँखो के द्वारा ही पक्का कर लिया। तब 'दही लो' राधा ने यह आवाज लगानी शुरू कर दी। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया केसरिया पट, केसरि खौद, बनौ गर गुज को हार ढरारो। को हौ जू आपनी या छवि सो जु खरे अँगना प्रति डीठि न डारो। आनि बिकाऊ से होइ रहे रसखानि कहे तुम्ह रोकि दुवारो। 'है तौ बिकाऊँ जौ लेत बनै हँसबोल तिहारो है मोल हमारो' ॥१५८॥ शब्दार्थ—पट = वस्त्र। खौर = तिलक। ढरारो = सुन्दर। अँगना = नारी। हँसबोल = हँस कर बाते करना। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह केसरिया रंग के वस्त्र धारण किए हुए है, मस्तक पर केसरी रग का तिलक लगा हुआ है, गले मे गुँजो का सुन्दर हार पहने हुए है। इस ब्रज मे कौन ऐसी नारी है जो इस शोभा को देखकर इस पर अपनी दृष्टि नही डालेगी, अर्थात् सभी नारियाँ इस शोभा को देखे बिना नही रह सकेगी। यदि तुम्हारा द्वार रोककर वह तुमसे यह कहे कि मै बिकने के लिए हूँ और मेरा मूल्य तुम्हारा हँसकर बात करना है तो तुम भी अन्य जैसी हो जाओगी, अर्थात् अपनी सुधि-बुधि भूलकर उनके सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दोगी। सवैया एक समय इक ग्वालिनि को ब्रजजीवन खेलत दृष्टि पर्यौ है। बाल प्रवीन सकै करि कै सरकाइ कै मौरन चीर घर्यौ है॥ यौ रस ही रस ही रसखानि सखो अपनो मन भायो कर्यौ है। नन्द के लाडिले ढाँकि दै सीस इहा हमरो वरु हाथ भर्यो है ॥१५६॥ शब्दार्थ—ब्रजजीवन = कृष्ण। सकै करि कै = बलपूर्वक।