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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

२५८ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से मिलन-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! एक समय एक गोपी ने कृष्ण को खेलते हुए देखा। वह बाला था और कृष्ण चतुर थे, अत कृष्ण ने बलपूर्वक अपने सिर से मोर-मुकुट उतार कर उसके सिर पर रख दिया। हे सखि ! इस प्रकार कृष्ण ने आनन्द- पूर्वक अपनी मनोकामना पूर्ण की। तब उस गोपी ने कहा—हे नन्द के प्रिय पुत्र, हमारा सिर ढँक दो, क्योकि हमारा हाथ तो खाली नही है, अत हम स्वयं अपना सिर ढँकने मे असमर्थ है। पाठातर—इस सवैया की दूसरी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'वाल प्रवीन प्रवीनता कै सरकाय काँधे लै चीर धर्यौ है।' सवैया मै रसखान की खेलनि जीति कै मालती माल उतार लई री। मेरीये जानि कै सूधि सबै चुप ह्वै रही काहु करी न खई री। भावते स्वेद की वास सखी ननदी पहिचानि प्रचड भई री। मैं लखिवौ लखि कै अँखियाँ मुसकाय लचाय नचाय दई री ॥१६०॥ शब्दार्थ—खेलनि जीति कै=खेल मे जीत कर। मेरीये=मेरी ही है। सूधि=भोली। खई=झगडा। भावते=प्रेम के। स्वेद=पसीना। प्रचड= अत्यन्त क्रुद्ध। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैने खेल मे आनन्द-सागर कृष्ण को जीत कर उसकी मालती की माला लेकर स्वय पहन ली। मेरी भोली सखियो ने यह समझकर कि यह माला मेरी ही है, मुझसे कोई झगडा नही किया, अर्थात् किसी प्रकार के व्यग्य नही कसे। उस माला मे से प्रेम-पसीने की सुगधि की पहिचान कर मेरी ननद मुझ पर अत्यन्त क्रुद्ध हुई। तब मैंने हँसकर, आँखो को नीचा करके और नचाकर, अर्थात् अपनी आँखो से अपने प्रेम-भाव को सूचित करके वह माला मैने उन्हे ही वापिस कर दी। विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रथावली' मे नही है। सवैया ब्रषभान के गेह दिवारी के द्यौस अहीर अहीरनि भीर भई। जितही तितही धुनि गोधन की सब ही ब्रज ह्वै रह्यौ राग मई॥