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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २५६ रसखान तबै हरि राधिका यो कछु सैननि ही रस बेल बई । उहि अंजन आँखिनि आँज्यौ भटू इन कुंकुम आड लिलार दई ॥१६१॥ शब्दार्थ—द्यौस = दिन । राग मई = रागपूर्ण, प्रेमानन्द से परिपूर्ण । बई = उत्पन्न हुई । उहि = कृष्ण ने । भटू = सखी । आड = तिलक । लिलार = मस्तक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वृषभानु के घर दिवाली के दिन अहीर और अहीरनियो की भारी भीड हुई । सब ओर से गोचारण के गीत गाये जा रहे थे जिनके कारण समूचा व्रज प्रेमानन्द से परिपूर्ण हो रहा था । उसी समय कृष्ण और राधा के मध्य नेत्रो के कुछ ऐसे संकेत हुए जिनके कारण उनके हृदयो मे आनन्द देने वाली प्रेम-बेलि उत्पन्न हुई । अपने प्रेम को साकेतिक रूप से प्रकट करने के लिए कृष्ण ने अपनी आँखो मे अंजन लगाया और राधा ने अपने मस्तक पर कुंकुम का तिलक लगाया । अंजन लगा कर कृष्ण ने संकेत से राधा को यह बताया कि मै तुम्हे अंजन की भाँति सदैव अपनी आँखो में रक्खूँगा, और तिलक लगाकर राधा ने यह प्रकट किया कि तुम्हारे कारण ही मेरा सौभाग्य बना रहेगा । विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रंथावली' मे नही है । सवैया बात सुनी न कहूँ हरि की, न कहूँ हरि सो मुख बोल हँसी है । काल्हि ही गोरस बेचन कौं निकसी व्रजवासिनि बीच लसी है ॥ आजु ही वारक 'लेहु दही' कहि कै कछु नैनन मैं बिहसी है । बैरिनि वाहि भई मुसकानि जु वा रसखानि के प्रान वसी है ॥१६२॥ शब्दार्थ—काल्हि ही = कल ही । गोरस = दही । लसी = सुशोभित होना । बारक = एक बार । अर्थ—कृष्ण-प्रेम मे व्याकुल किसी गोपी का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसने तो कभी कृष्ण की बात भी नही सुनी, न कभी उसने हँसकर कृष्ण से बाते की हैं । यह तो कल ही दही बेचने के लिए निकली थी और व्रजवासियो के मध्य सुशोभित हो रही थी । आज