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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

२६० रसखान-ग्रन्थावली ही वह एक बार यह कह कर कि 'दही लेओ' वह आँखो ही आँखों मे कुछ मुस्करा दी थी। उसकी वही मुसकराहट उसके लिए वैरिन बन गई और वह आनन्द-सागर कृष्ण के प्राणो मे बस गई, अर्थात् कृष्ण उस पर मुग्ध हो गये। सवैया ग्वलनि द्वैक भुजान गहै रसखानि कौ लाई जसोमति पाहै। लूटत हैं कहैं ये वन मैं मन मै कहै ये सुख-लूट कहाँ है॥ अंग ही अंग ज्यौं ज्यौं ही लगै त्यौं त्यौं ही न अंग ही अंग समाहै। वे पछलै उलटे पग एक तौ वै पछलै उलटे पग जाहै ॥१६३॥ शब्दार्थ—पाहैँ=पास। न अंग ही अंग समाहैँ=अपने अंगो मे नहीं समाती है, अर्थात् अत्यन्त प्रसन्न होती है। अर्थ—दो-एक ग्वालिन कृष्ण को बाँहो से पकड़कर यशोदा जी के पास ले गई और उनसे कृष्ण की शिकायत करने लगी कि इनसे पूछो कि ये वन मे और मन मे हमे लूटते है। भला इनसे इनको क्या सुख मिलता है ? हमारे अंग से ज्यो-ज्यो इनका शरीर छूता है तो ऐसे आनन्द का अनुभव होता है कि हम अपने अंगो मे ही नही समाती, अर्थात् अत्यन्त प्रसन्न होती है। गोपियाँ यदि एक पग लौटती है तो ये लौटकर उनके मार्ग को घेर लेते है। विशेष—उपालम्भ के माध्य से कृष्ण के प्रति गोपियो के अमित प्रेम का वर्णन है। सवैया दूर ते आई दुरे ही दिखाइ अटा चढि जाइ गह्यो तहाँ आरौ। चित्त कहूँ चितवै कितहूँ, चित्त और सो चाहि करै चखवारौ ॥ रसखानि कहै यहि बीच अचानक जाइ सिढी चढि खास पुकारौ। सूखि गई सुकुवार हियो हनि सैन पटू कह्यौ स्याम सिधारौ ॥ १६४॥ शब्दार्थ—चितवै=देखना। सिढी=सीढी। भटू=सखी। अर्थ—दूर से आते हुए कृष्ण को दिखाकर किसी गोपी ने अपनी सखी से कहा कि अटारी पर चढ कर देखो कि कृष्ण कहाँ आ गया है। यह सुन कर वह सखी ऊपर गई, पर उसका मन कही था और वह देख किसी और ओर रही थी (क्योकि उसके मन मे डर था कि घर के लोग उसे देख न ले ।) रस- खान कहते है कि जब वह कृष्ण को देख रही थी तो इसी बीच अचानक सिढ़ी

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