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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग २६१ 'पर चढ़कर उसकी सासु ने उसे आकर पुकारा । इस भय से कि कही सासु ने उन्हे देख तो नही लिया है, वह कोमलागी भय के मारे सूख गई, उसका हृदय धडकने लगा । उसकी भयग्रस्त दशा को देखकर उसकी सखी ने आँखों के इशारे से ही बता दिया कि कृष्ण चला गया है, अत. डरने की कोई बात नही है । पाठान्तर—इस सवैया की द्वितीय पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है— 'चित्त कहूँ चितवै कितहूँ चित चोर सो चाहि करै चख चारौ ।' तुलना—'ताही समै औचक ही चढि परकारी 'सेख' सासु आनि अनजानि नीचे ते पुकारिये । मूरछि मृगाछी गिरी हियो हनि हाथनि सो । नैनन सो कह्यौ हा हा स्याम जू सिधारिये ।।' —शेख आलम दोहा बक बिलोकनि हसनि मुरि, मधुर बैन रसखानि । मिले रसिक रसराज दोउ, हरखि हिये रसखानि ॥ १६५ ॥ शब्दार्थ —बक बिलोकनि=वक्र दृष्टि । हरखि=हर्षित होकर । अर्थ—मिलन का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि वक्र दृष्टि से मुड़कर हँसते हुए और मधुर वचन बोलते हुए आनन्द सागर कृष्ण हृदय मे हर्षित होकर राधा से इस प्रकार मिले मानो रसिक और रसराज दोनो मिल गये हों । विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार । प्रेम-वेदना सवैया वह गोधन गावत गोधन मैं जब ते इंहि मारग ह्वै निकस्यौ । तब ते कुलकानि कितीय करौ यह पापी हियो हुलस्यौ हुलस्यौ ॥ अब तौ जु भई सु भई नहि होत है लोग अजान हँस्यौ सुहँस्यौ । कोउ पीर न जानत जानत सो तिनके हिय मै रसखानि वस्यौ ॥१६६॥ शब्दार्थ—गोधन=गोचारण का गीत । गोधन मै=गऊओ के समूह मे । कितीय करौ=कितना ही करे, कितना ही रोके ।