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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२६२ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने आकर्षण को व्यक्त करती हुई कहती है कि जब से कृष्ण गोचारण के गीत गाता हुआ गौओं के समूह के साथ इस मार्ग से निकला है, तब से यह कुल की मर्यादा चाहे जितना रोकती है, पर यह पापी हृदय बार-बार हुलस रहा है। अब तो जो हो गया है, सो हो गया है, वह टल नहीं सकता, चाहे अज्ञानी लोग कितना ही मुझ पर हँसे, मेरे हृदय की वेदना को कोई नहीं जानता, केवल वही जान सकता है जिसके हृदय मे आनन्द-सागर कृष्ण बसा हुआ है, अर्थात् जिसे कृष्ण से प्रेम है। विशेष—प्रथम पंक्ति मे यमक अलंकार है। सवैया वा मुसकान पै प्रान दियौ जिय जान दियौ वहि तान पै प्यारी। मान दियौ मन मानिक के सग वा मुख मजु पै जोवनवारी॥ वा तन कीं रसखानि पै री तन ताहि दियौ नहिं ग्यान विचारै। सो मुंह मोरि करौ अब का भए लाल लै आज समाज मे ख्वारी॥१६७॥ शब्दार्थ—मजु=सुन्दर। आन=मर्यादा। ख्वारी=बदनामी। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि! मैंने कृष्ण की मुसकराहट पर अपने प्राणो को न्योछावर कर दिया था। उसकी मधुर बाँसुरी की तान पर अपने जी को न्योछावर कर दिया था। अपने मन रूपी मोती के साथ ही मैंने अपना सम्मान भी उन्हे सौप दिया था; अर्थात् प्रेम के कारण जो बदनामी होगी, उसकी भी मैंने तनिक भी चिन्ता नहीं की थी। उसके सुन्दर मुख पर मैने अपने यौवन को न्योछावर कर दिया था। उसके शरीर पर मैंने अपना शरीर वार दिया था। इस आत्म-समर्पण मे मैंने अपनी कुल मर्यादा का भी विचार नहीं किया था। जिस कृष्ण के लिए समाज मे मेरी बदनामी हुई है, वह कृष्ण अब मुझसे मुँह मोडकर चला गया है। यह बडे ही दुख की बात है। विशेष—रूपक अलंकार। सवैया मोहन सो अटक्यौ मनु री कल जाते परै सोई क्यों न बतावै। व्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूपन भावै॥