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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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देखे ते नेकु सम्भार रहै न तबै झुकि के लखि लोग लजावै । चैन नही रसखानि दुहूँ विधि भूली सबै न कछू बनि आवै ॥ १६८॥ शब्दार्थ—कल जातें परै = जिससे सुख हो । नेकु = तनिक । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन कृष्ण से लग गया है जिसके कारण मैं सदैव व्याकुल रहती हूँ। मेरी यह व्याकुलता नष्ट हो और मुझे सुख मिले, ऐसी विधि मुझे कोई नहीं बताता । कृष्ण की मूर्ति को देखे बिना मुझे व्याकुलता रहती है। भूख भाग जाती है, अर्थात् कुछ भी खाने को मन नही करता और न आभूषण ही मुझे अच्छे लगते हैं। किन्तु जब मैं उन्हे देख लेती हूँ तो अपने को तनिक भी नहीं सँभाल पाती, तब उसके सामने मुझे झुकी देखकर लोग मुझे लज्जित करते हैं। रसखान कहते हैं कि मुझे दोनो प्रकार से चैन नही है। उनके देखने पर और न देखने पर मैं सब कुछ भूल जाती हूँ और उस समय मुझे कोई उपाय नहीं सूझता। सवैया भई बावरी ढूँढति वाहि तिया अरी लाल ही लाल भयौ कहा तेरो । ग्रीवा ते छूटि गयौ अबही रसखानि तज्यौ घर मारग हेरो ॥ डरियै कहै माय हमारी बुरी हिय नेकु न सूनो सहै छिन मेरो । काहे को खाइबो जाइबो है सजनी अनखाइबो सीस सहेरो ॥ १६६ ॥ शब्दार्थ—लाल = रत्न । लाल = कृष्ण । ग्रीवा = गर्दन, हृदय । माय = सासु । अनखाइबो = डाँट-फटकार । सहेरो = सहना ही पड़ेगी । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के विरह में पागल सी हो गई है । उसकी सखी उससे उस स्थिति का कारण पूछती है तो वह कुशलता से और बाते उसे बताती है । दूसरी सखी पूछती है कि हे सखि ! तुम पागल सी बनकर किसको ढूँढ रही हो ? वह उत्तर देती है—मेरे हार का रत्न टूट कर गिर गया है । वह अभी-अभी मेरी गर्दन से छूट कर गिर गया है । मैंने घर तक का मार्ग ढूँढ़ लिया है, लेकिन वह मिला ही नहीं । यह सुन कर उसकी सखी कहती है—तब इसमे डरने की क्या बात है ? वह उत्तर देती है—मेरी सासु बहुत बुरी है, वह मेरे हृदय को क्षणभर के लिए भी सूना नहीं देख सकती । अब तो उसका पाना-पाना क्या है । अब तो मुझे सासु की डाँट-फटकार सहनी ही पड़ेगी ।