रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशेष-१ वाग्वैदग्ध्य की सुन्दर योजना है। २. लाल शब्द के प्रयोग मे यमक अलंकार है। सवैया मो मन मोहन कों मिलि कै सबहीं मुसकानि दिखाइ दई। वह मोहनी मूरति रूपमई सबही चितई तब ही चितई ॥ उन तौ अपने अपने घर की रसखानि चली विधि राह लई । कछु मोहि को पाप पर्यो पल मैं पग पावत पौरि पहार भई ॥ १७०॥ शब्दार्थ-रूपमई = सौन्दर्य युक्त । चितई = देखना । पग पावत पौरि पहार भई = पैदल अपने घर तक पहुँचना पहाड बन गया । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरा मन जब मोहन के मन से मिला; अर्थात् जब मुझे कृष्ण के प्रति प्रेम हुआ तो सारी सखियाँ मुस्करा दीं। वास्त- विकता तो यह है कि कृष्ण की सौन्दर्यमयी मूर्ति को जब सब अन्य सखियों ने देखा था तो मैंने भी देखा था । रसखान कहते हैं कि वे सब तो अपने-अपने घर अच्छी तरह से पहुँच गईं, पर मुझे ही पल भर मे यह पाप लगा है कि पैदल अपने घर तक पहुँचना मेरे लिए पहाड बन गया, अर्थात् बहुत कठिन हो गया। सवैया डोलिवो कुंजनि कुंजनि को अरु वेनु बजाइवो धेनु चरैवो । मोहिनी ताननि सो रसखानि सखानि के संग को गोधन गैवो ॥ ये सब डारि दिये मन मारि विसारि दयौ सगरौ सुख पैवो । भूलत क्यो करि नेहन ही को 'दही' करिवो मुसकाई चितैवो ॥ १७१॥ शब्दार्थ-वेनु = वेणु वंशी । मोहिनी = मोहित करने वाली । रसखानि = आनन्द-सागर कृष्ण । गोधन = गोचारण के गीत । अर्थ - एक गोपी अपने हृदय मे उमड़े हुए कृष्ण-प्रेम का वर्णन अपनी सखी से करती है कि आनन्द-सागर कृष्ण का कुन्ज-कुन्ज मे घूमना, वंशी बजाना गौएँ चराना, मोहित करने वाली ताने सुनाना, अपने साथियो के साथ गोचा- रण के गीत गाना, प्रेम से दही मांगना और मुस्करा कर देखना कैसे भूला जा सकता है ? अर्थात् कृष्ण की ये सब क्रीड़ाएँ मेरे मन मे गड़ गई हैं। इन्होने